मोदी ने किया क्या है?
रायसकारात्मक राय

गुटनिरपेक्ष दर्शक से घोषणापत्र के लेखक तक

प्रकाशित: 23 सित॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की, 140-पैराग्राफ की सहमति वाली घोषणा दी

1955 में भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव इसलिए भी रखी क्योंकि युद्धोत्तर विश्व-व्यवस्था लिखने वाली मेज़ पर उसकी कोई असली सीट नहीं थी — वह फैसलों पर एतराज़ जता सकता था, उन्हें गढ़ नहीं सकता था। सत्तर साल बाद, 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी का मतलब सिर्फ एक अच्छा सम्मेलन आयोजित करना नहीं था — भारत ने व्यापार, वित्त, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य और कृषि पर नई दिल्ली घोषणापत्र के 140 अनुच्छेद लिखने में भूमिका निभाई, वह भी उस समूह में जो पांच संस्थापक सदस्यों से बढ़कर ग्यारह हो चुका है। यही इस कहानी का बड़ा पहलू है — न क्षेत्रीय, न किसी के खिलाफ, बस एजेंडा पाने और एजेंडा तय करने के बीच का फर्क। एक आम किसान, छोटे निर्यातक या आयुर्वेद चिकित्सक के लिए अगले हफ्ते कुछ नहीं बदलेगा, और यह साइट इससे मुंह नहीं मोड़ेगी। घोषणापत्र एक सहमति से बना दस्तावेज़ है, कोई बाध्यकारी संधि नहीं; इसके व्यापार और वित्त संबंधी प्रावधान न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे धीमे संस्थागत रास्तों से आगे बढ़ते हैं, और पारंपरिक चिकित्सा पर नया कार्यसमूह अभी एक शुरुआत भर है, कोई बाज़ार नहीं। असली मतभेद रखने वाले ग्यारह देशों का सहमति की भाषा पर दस्तखत करना उन मतभेदों को मिटाता नहीं — बस उन्हें समायोजित करता है। यह शिखर सम्मेलन जो पक्का करता है, वह पैमाने का नहीं, स्वभाव का बदलाव है: भारत अब वह देश है जिसके राजनयिक सम्मेलन में मसौदा लिखते हैं, सिर्फ हाज़िरी नहीं भरते। यह सस्ता कर्ज़, आसान निर्यात लाइसेंस या किसी घरेलू औषधि के लिए बड़ा बाज़ार बनेगा या नहीं — यह एक लंबी, धीमी कहानी है, जिसे संस्थागत रास्तों के असल में हिलने पर दोबारा परखना होगा।
शेयर करेंWhatsAppXFacebook

चर्चा

चर्चा में शामिल होने के लिए Google से साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। अपनी राय साझा करने वाले पहले व्यक्ति बनें।