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एक पीढ़ी ने बाल-विवाह घटाया — जो कानून मदद करने वाला था, वह अब भी अटका है

प्रकाशित: 23 सित॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: युवा महिलाओं में बाल विवाह चार NFHS सर्वेक्षणों में 47.4% से घटकर 20.1% हुआ — लेकिन विवाह आयु बढ़ाने वाला 2021 का विधेयक अब भी अटका हुआ है

जब भारत आज़ाद हुआ, देश के ज़्यादातर हिस्सों में एक लड़की की ज़िंदगी उसके पढ़ना सीखने से पहले ही लिखी जा चुकी होती थी — बचपन में ब्याह दी जाती, किसी और के घर भेज दी जाती, स्कूल जाना — अगर कभी गया भी हो — वहीं खत्म हो जाता। यह बदलना कभी सिर्फ एक कानून बनाने से नहीं होने वाला था। शारदा एक्ट, जिसने कागज़ पर शादी की उम्र बढ़ाई थी, 1929 से मौजूद था, लेकिन दशकों तक ज़मीन पर लगभग कुछ नहीं बदला — क्योंकि कानून गरीबी नहीं मिटा सकता, न ही उस परिवार का हिसाब बदल सकता है जो एक और पेट भरने की चिंता कम करना चाहता है, और न उस गांव को बदल सकता है जहां आठवीं के बाद बेटी के लिए कोई स्कूल ही नहीं है। असली आंकड़ा यह है: 2005-06 में, लगभग आधी युवा भारतीय महिलाएं — 47.4% — 18 साल की उम्र से पहले ब्याही जा चुकी थीं। 2023-24 तक यह घटकर 20.1% रह गया। यह कोई मामूली नीतिगत बदलाव नहीं है; यह इस बात में पीढ़ीगत बदलाव है कि भारत में लड़की होना कैसा है — ज़्यादा लड़कियां स्कूल में टिकी रहीं, ज़्यादा परिवारों को बेटी की जल्दी शादी में नुकसान दिखने लगा, कानून की जागरूकता बढ़ी। लेकिन ईमानदार सच यह भी है: दिसंबर 2021 में पेश हुआ वह बिल, जो शादी की कानूनी उम्र बढ़ाकर 21 करना चाहता था, तभी से संसदीय समिति में पड़ा है — कहीं आगे नहीं बढ़ा। कानून लागू होना लगभग सैद्धांतिक ही है: 2020 में पूरे देश में सिर्फ 785 मामले दर्ज हुए, जबकि यह प्रथा आज भी हर पांच में से करीब एक युवा महिला को प्रभावित करती है, और बिहार-पश्चिम बंगाल में यह दर दोगुनी है। यह आंकड़ा जिस लड़की की बात करता है, उसे कागज़ पर लिखा कानून नहीं बचाता। उसे बचाता है — जहां बचाता है — वह स्कूल जो उसे दाखिल रखे रहा, और वह परिवार जिसने इंतज़ार करना चुना।
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