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2014 से पहले के इकतीस मामले: किस पर आरोप, कितना सार्वजनिक धन, और अदालतों ने असल में क्या साबित किया

प्रकाशित: 9 अक्टू॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: 2014 से पहले के बड़े भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामले: क्या आरोप थे और हर मामला कैसे ख़त्म हुआ

नीचे 2014 से पहले के सबसे ज़्यादा चर्चित मामले हैं, हर एक एक ही ढंग से: क्या आरोप था, कौन ज़िम्मेदार था (नाम नहीं, भूमिका), कितना सार्वजनिक धन या सरकार की भूमिका थी, क्या साबित हुआ, और अंत कैसे हुआ। नाम जान-बूझकर नहीं दिए गए। इनमें से कई मामले एक से अधिक सरकारों में फैले, इसलिए यहां किसी दल या दौर का हिसाब नहीं हो रहा। 1. सेना की जीप खरीद (1948) • आरोप: लगभग ₹80 लाख का सेना-जीप सौदा प्रक्रिया को दरकिनार कर किया गया; सेना ने जीपें घटिया बताकर ख़ारिज कीं, फिर भी भुगतान हो चुका था। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त, जिन्होंने अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: पूरा पैसा सरकारी (लगभग ₹80 लाख) और सरकारी ख़रीद। • साबित हुआ?: प्रक्रिया-उल्लंघन व्यापक रूप से दर्ज हुए; किसी अदालत ने आपराधिक दोष स्थापित नहीं किया। • अंतिम नतीजा: 1955 में बिना अभियोजन के मामला बंद। 2. LIC शेयर-ख़रीद सौदा (1957) • आरोप: LIC ने अपनी निवेश समिति की सलाह के ख़िलाफ़ कलकत्ता के एक ही व्यवसायी की छह कंपनियों के शेयरों में लगभग ₹1.26 करोड़ लगाए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): वह निजी व्यवसायी जिनकी कंपनियों को पैसा मिला। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी स्वामित्व वाली LIC का धन (लगभग ₹1.26 करोड़)। • साबित हुआ?: द्वितीयक स्रोतों में साबित बताया गया (प्रकाशन से पहले अदालती रिकॉर्ड से पुष्टि ज़रूरी)। • अंतिम नतीजा: व्यवसायी पर मुक़दमा चला; दोषसिद्धि द्वितीयक स्रोतों में दर्ज है — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 3. तेजा शिपिंग ऋण (1960) • आरोप: एक शिपिंग कंपनी को दिए गए लगभग ₹22 करोड़ के सरकारी ऋण वापस नहीं हुए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): शिपिंग कंपनी के प्रवर्तक, जो देश छोड़कर चले गए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी ऋण (लगभग ₹22 करोड़)। • साबित हुआ?: ऋण की अदायगी न होना दर्ज है; देखे गए स्रोतों में कोई दोषसिद्धि नहीं मिली। • अंतिम नतीजा: प्रवर्तक सरकार का पैसा बकाया छोड़कर विदेश चले गए; देखे गए स्रोतों में वसूली का ज़िक्र नहीं। 4. HDW पनडुब्बी कमीशन आरोप (1987) • आरोप: जर्मन आपूर्तिकर्ता पर पनडुब्बी का ठेका पाने के लिए भारतीय बिचौलियों को कमीशन देने का आरोप लगा। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): विदेशी आपूर्तिकर्ता और कथित भारतीय बिचौलिए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: रक्षा ख़रीद अनुबंध; देखे गए स्रोतों में रकम पुष्ट नहीं। • साबित हुआ?: देखे गए स्रोतों में स्थापित नहीं — कोई दोषसिद्धि नहीं मिली। • अंतिम नतीजा: आपूर्तिकर्ता भारत में ब्लैकलिस्ट हुआ; आख़िरी दो पनडुब्बियों का देश में निर्माण रद्द हुआ। 5. बोफ़ोर्स तोप सौदा (1987 में उजागर) • आरोप: 400 तोपों के ₹1,437 करोड़ के सौदे (मार्च 1986) में लगभग ₹64 करोड़ की कथित दलाली। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): स्वीडिश आपूर्तिकर्ता, कथित बिचौलिए और राजनीतिक आरोपों में सार्वजनिक पदाधिकारी; किसी को दोषी नहीं ठहराया गया। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: ₹1,437 करोड़ की सरकारी रक्षा ख़रीद। • साबित हुआ?: नहीं — अदालतों ने दलाली का मामला स्थापित नहीं किया। • अंतिम नतीजा: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक कारोबारी परिवार सहित सभी आरोपियों को बरी (डिस्चार्ज) किया; सुप्रीम कोर्ट ने CBI की अपील ख़ारिज की। 6. प्रतिभूति घोटाला (1992) • आरोप: जाली बैंक रसीदों के सहारे बैंकों का पैसा शेयर बाज़ार में लगाया गया; स्रोत के अनुसार रकम लगभग ₹4,000 करोड़ से ₹10,000 करोड़ तक बताई जाती है। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): एक शेयर दलाल, बैंक अधिकारियों की मदद से। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का धन और प्रतिभूतियां शामिल। • साबित हुआ?: हां — दलाल कम से कम एक मामले में दोषी ठहराया गया। • अंतिम नतीजा: दोषसिद्धि हुई; कुल रकम स्रोतों के बीच अब भी अनिश्चित। 7. चीनी आयात (1994) • आरोप: चीनी आयात से देश को लगभग ₹1,000 करोड़ (~$320 मिलियन) का नुकसान होने का आरोप। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): तत्कालीन नागरिक आपूर्ति मंत्री को अप्रत्यक्ष भूमिका के लिए संसद में दोषी ठहराया गया। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी आयात निर्णय; नुकसान एक अनुमानित आंकड़ा है। • साबित हुआ?: संसदीय आरोपपत्र; देखे गए स्रोतों में कोई आपराधिक निष्कर्ष नहीं मिला। • अंतिम नतीजा: मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया। 8. यूरिया आयात अग्रिम (1995–96) • आरोप: 2 लाख टन यूरिया के लिए तुर्की के आपूर्तिकर्ता को लगभग ₹133 करोड़ अग्रिम दिए गए, जो कभी नहीं आया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): विदेशी आपूर्तिकर्ता (कथित सरग़ना), और भारतीय बिचौलिए व अधिकारी। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनी ने लगभग ₹133 करोड़ दिए। • साबित हुआ?: आंशिक रूप से — एक पूर्व प्रधानमंत्री के रिश्तेदार दोषी ठहराए गए; पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र पर मुक़दमा नहीं चला। • अंतिम नतीजा: 2018 में रिश्तेदार को 3 साल की सज़ा। 9. जैन 'हवाला' डायरी (1996) • आरोप: हवाला दलालों के ज़रिये राजनेताओं को लगभग $18 मिलियन के कथित भुगतान, जो डायरी में दर्ज थे। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): हवाला दलाल और डायरी में नामित राजनेता। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: अवैध राजनीतिक फ़ंडिंग; सरकारी नुकसान का कोई आंकड़ा नहीं। • साबित हुआ?: नहीं — सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डायरी की प्रविष्टियों को पुष्टि चाहिए; मामला साबित नहीं हो सका। • अंतिम नतीजा: 1997–98 में सारे मामले बरी/डिस्चार्ज के साथ ख़त्म; पर इससे अदालत की निगरानी में CBI जांच की मिसाल बनी (CBI की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला)। 10. टेलीकॉम केबल ठेका (1996) • आरोप: दूरसंचार मंत्री ने ₹30 करोड़ का केबल-आपूर्ति ठेका एक निजी फ़र्म को देने के लिए ₹3 लाख की रिश्वत ली। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): तत्कालीन दूरसंचार मंत्री। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: ₹30 करोड़ का सरकारी दूरसंचार अनुबंध। • साबित हुआ?: हां। • अंतिम नतीजा: दोषी करार; 2011 में 5 साल की सज़ा। 11. चारा घोटाला, बिहार (1990 के दशक) • आरोप: फ़र्ज़ी बिलों के ज़रिये पशुपालन विभाग के ₹950 करोड़ से अधिक की निकासी। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): अधिकारी, आपूर्तिकर्ता और राजनेता, जिनमें तत्कालीन मुख्यमंत्री और एक पूर्व मुख्यमंत्री शामिल थे। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: राज्य सरकार का ख़ज़ाना (₹950 करोड़ से अधिक)। • साबित हुआ?: कई मामलों में हां; चौथे मामले में एक पूर्व मुख्यमंत्री बरी हुए। • अंतिम नतीजा: तत्कालीन मुख्यमंत्री सभी पांच मामलों में दोषी ठहराए गए (पांचवां 2022 में)। 12. UTI यूएस-64 संकट (1998–2002) • आरोप: भारत की सबसे बड़ी म्यूचुअल फ़ंड योजना का मूल्य गिरा; नुकसान लगभग ₹4,800 करोड़ आंका गया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): सरकार-समर्थित यूनिट ट्रस्ट का फ़ंड-प्रबंधन; देखे गए स्रोतों में कोई व्यक्ति दोषी स्थापित नहीं। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी राहत पैकेज: ₹3,300 करोड़ (1999) और ₹14,561 करोड़ (2002)। • साबित हुआ?: यह कुप्रबंधन/बेलआउट का मामला है; देखे गए स्रोतों में कोई फ़ैसला नहीं मिला। • अंतिम नतीजा: करदाताओं के पैसे से राहत; देखे गए स्रोतों में किसी व्यक्ति पर फ़ैसला नहीं मिला। 13. शेयर कीमत हेरफेर और सहकारी बैंक ऋण (2001) • आरोप: एक दलाल ने चुने हुए शेयरों की कीमतें बढ़ाईं, जिसके लिए एक सहकारी बैंक से नियम-विरुद्ध ऋण (लगभग ₹1,030 करोड़ तक) मिले। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): एक शेयर दलाल; सहकारी बैंक के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सहकारी बैंक (जमाकर्ताओं का धन); RBI ने बाद में उसका लाइसेंस रद्द किया। • साबित हुआ?: हां — SEBI ने दलाल को 14 साल के लिए प्रतिबंधित किया (2003)। • अंतिम नतीजा: 2014 में विशेष CBI अदालत ने दलाल को दोषी ठहराया (2 साल)। 14. फ़र्ज़ी स्टांप पेपर रैकेट (2003 में उजागर) • आरोप: 1992–2003 के बीच 12 से अधिक राज्यों में नक़ली स्टांप पेपर बिके; अनुमान ₹20,000–30,000 करोड़ तक। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): स्टांप विक्रेता से सरग़ना बने एक व्यक्ति और अधिकारियों का नेटवर्क। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी स्टांप राजस्व; बैंकों, बीमा कंपनियों और रजिस्ट्रारों ने नक़ली स्टांप ख़रीदे। • साबित हुआ?: हां। • अंतिम नतीजा: 2007 में दोषी करार: 30 साल की सज़ा और ₹202 करोड़ जुर्माना। 15. संयुक्त राष्ट्र 'तेल के बदले भोजन' कमीशन (रिपोर्ट 2005, अंतरराष्ट्रीय) • आरोप: संयुक्त राष्ट्र जांच में दुनियाभर की 2,400+ कंपनियों व व्यक्तियों द्वारा लगभग $1.8 अरब की दलाली सामने आई; भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री और सत्तारूढ़ दल को 4-4 मिलियन बैरल के 'गैर-अनुबंधित लाभार्थी' बताया गया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): भारतीय जांच में तत्कालीन विदेश मंत्री और उनके पुत्र को दोषी ठहराया गया। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: इराक़ी तेल आवंटन; भारतीय सार्वजनिक धन नहीं। • साबित हुआ?: आंशिक रूप से — 2006 की भारतीय जांच ने मंत्री व उनके पुत्र को ठेके दिलाने का दोषी बताया, पर उन तक पैसा नहीं पहुंचा पाया गया। • अंतिम नतीजा: मंत्री नवंबर 2005 में हटाए गए; देखे गए स्रोतों में कोई आपराधिक दोषसिद्धि नहीं। 16. सत्यम लेखा धोखाधड़ी (2009) • आरोप: आईटी कंपनी के खाते झूठे पाए गए; धोखाधड़ी लगभग ₹7,000 करोड़ (एक स्रोत में ₹12,320 करोड़)। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): कंपनी के संस्थापक-चेयरमैन और आठ अन्य। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: निजी सूचीबद्ध कंपनी; सीधे सरकारी धन नहीं (निवेशक और बाज़ार प्रभावित)। • साबित हुआ?: हां। • अंतिम नतीजा: अप्रैल 2015 में विशेष CBI अदालत ने संस्थापक सहित 9 को 7 साल की सज़ा सुनाई। 17. 2G स्पेक्ट्रम लाइसेंस (CAG 2010) • आरोप: सस्ते दामों पर लाइसेंस बांटने से CAG ने ₹1,76,379 करोड़ का 'अनुमानित नुकसान' आंका। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): तत्कालीन दूरसंचार मंत्री, अधिकारी और दूरसंचार कंपनियां आरोपित थीं। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी लाइसेंसिंग निर्णय; आंकड़ा ऑडिट अनुमान है, सिद्ध नुकसान नहीं। • साबित हुआ?: नहीं — अदालत ने कहा कि अभियोजन कोई भी आरोप साबित करने में 'बुरी तरह विफल' रहा। • अंतिम नतीजा: 21 दिसंबर 2017 को विशेष CBI अदालत ने सभी 18 आरोपियों को बरी किया। 18. राष्ट्रमंडल खेल ठेके (2010) • आरोप: खेलों से जुड़े बढ़े-चढ़े ठेके और अनियमित भुगतान; लोकप्रिय अनुमान ₹35,000 करोड़ से ₹1 लाख करोड़ तक हैं पर कमज़ोर स्रोतों पर टिके हैं। आरोपपत्र में टिका एकमात्र आंकड़ा एक टाइमिंग-रिज़ल्ट ठेके में ₹90 करोड़ से अधिक का है। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): आयोजन समिति के अध्यक्ष, महासचिव और अन्य आरोपित। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: खेलों के लिए सार्वजनिक धन। • साबित हुआ?: फ़रवरी 2013 में आरोप तय हुए; देखे गए स्रोतों में दोष सिद्ध नहीं। • अंतिम नतीजा: अंतिम नतीजा देखे गए स्रोतों में नहीं मिला — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 19. आदर्श हाउसिंग सोसाइटी (2010) • आरोप: युद्ध-विधवाओं और पूर्व सैनिकों के लिए तय ज़मीन पर मुंबई में 31 मंज़िला इमारत बनी और अन्य लोगों को दे दी गई; 25 आवंटन अवैध पाए गए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): जांच के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक ज़मीन। • साबित हुआ?: जांच में अनियमित आवंटन मिले; देखे गए स्रोतों में आपराधिक दोष सिद्ध नहीं। • अंतिम नतीजा: तत्कालीन मुख्यमंत्री ने नवंबर 2010 में इस्तीफ़ा दिया; अदालती अंतिम नतीजा नहीं मिला — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 20. एंट्रिक्स–देवास उपग्रह सौदा (CAG) • आरोप: CAG के मसौदे में निजी कंपनी को उपग्रह स्पेक्ट्रम पट्टे पर देने से ₹2 लाख करोड़ तक के अनुमानित राजस्व नुकसान का अंदाज़ा लगाया गया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): एंट्रिक्स (इसरो की व्यावसायिक शाखा) और निजी कंपनी; कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हुआ। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक स्पेक्ट्रम और अंतरिक्ष एजेंसी का अनुबंध। • साबित हुआ?: रिश्वत कभी नहीं मिली; अनियमितताओं के कारण सौदा रद्द हुआ। • अंतिम नतीजा: सरकार ने सौदा रद्द किया; इस रद्दीकरण से भारत को बाद में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में हार झेलनी पड़ी। 21. कोयला ब्लॉक आवंटन, 'कोलगेट' (CAG 2012–13) • आरोप: CAG ने कहा कि 2004–09 में कोयला ब्लॉक अकुशल ढंग से बांटे गए; मसौदे का ₹10.67 लाख करोड़ का अनुमान अंतिम रिपोर्ट में घटकर ₹1.86 लाख करोड़ रह गया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): सरकारी आवंटन निर्णय; अलग-अलग मामलों में बाद में अधिकारी और कंपनी अधिकारी आरोपित हुए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक कोयला भंडार। • साबित हुआ?: आंशिक रूप से — कुछ मुक़दमे दोषसिद्धि में, कुछ बरी या बंद होने में ख़त्म हुए। • अंतिम नतीजा: एक मामले में पूर्व सांसद और पूर्व कोयला सचिव दोषी ठहराए गए; एक प्रमुख उद्योगपति का मामला बंद; अन्य मुक़दमे जारी। 22. झारखंड खनन आवंटन (2000 के दशक) • आरोप: खनन ठेके रिश्वत लेकर देने का आरोप; जांच एजेंसियों के अनुसार लगभग ₹4,000 करोड़। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री और सहयोगी। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: राज्य के खनन लाइसेंस। • साबित हुआ?: कोयला मामले में हां। • अंतिम नतीजा: दिसंबर 2017 में पूर्व मुख्यमंत्री दोषी करार (3 साल, ₹25 लाख जुर्माना)। 23. बेल्लारी अवैध लौह-अयस्क खनन (लोकायुक्त 2006–10) • आरोप: कर्नाटक लोकायुक्त ने अवैध खनन से नुकसान ₹16,085 करोड़ आंका। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): लोकायुक्त रिपोर्टों में नामित खनन कंपनी मालिक और सरकारी अधिकारी। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: राज्य की खनिज संपदा और सरकारी पट्टे। • साबित हुआ?: जांच हुई; देखे गए स्रोतों में अंतिम अदालती नतीजा नहीं मिला। • अंतिम नतीजा: एक पूर्व राज्य मंत्री गिरफ़्तार हुए; अंतिम फ़ैसला नहीं मिला — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 24. गोवा अवैध लौह-अयस्क खनन (शाह आयोग) • आरोप: शाह आयोग ने गोवा में अवैध खनन लगभग ₹34,935 करोड़ का बताया। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): रिपोर्ट में तत्कालीन खनन मंत्री (पूर्व मुख्यमंत्री) को दोषी बताया गया; खनन कंपनियां भी नामित। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: राज्य के खनन पट्टे। • साबित हुआ?: आयोग का निष्कर्ष; देखे गए स्रोतों में आपराधिक दोष सिद्ध नहीं। • अंतिम नतीजा: अलग मामले दर्ज (राज्य क्राइम ब्रांच और लोकायुक्त); अंतिम नतीजा नहीं मिला — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 25. उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य मिशन निधि (CAG 2005–11) • आरोप: CAG ने UP में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के ₹5,000 करोड़ से अधिक की निकासी पाई (एक अन्य अनुमान: ₹10,000 करोड़)। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): CBI मामलों के अनुसार राज्य स्वास्थ्य अधिकारी और राजनेता। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: केंद्र और राज्य की स्वास्थ्य-मिशन निधि। • साबित हुआ?: CBI जांच; देखे गए स्रोतों में अंतिम नतीजा नहीं मिला। • अंतिम नतीजा: मामले से जुड़े अधिकारियों की कई मौतों की ख़बरें आईं; मुक़दमे देखे गए स्रोतों में निपटे नहीं — प्रकाशन से पहले पुष्टि करें। 26. शारदा चिट फ़ंड (2013) • आरोप: एक समूह ने बंगाल, असम और ओडिशा में लगभग 17 लाख जमाकर्ताओं से ~₹2,459 करोड़ जुटाए; लगभग ₹1,983 करोड़ अदा नहीं हुए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): समूह के प्रवर्तक। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: निजी जमा; राजनीतिक संबंधों के आरोप लगे और केंद्रीय एजेंसियों ने जांच की। • साबित हुआ?: जांच जारी; ED ने संपत्तियां कुर्क कीं; देखे गए स्रोतों में फ़ैसले नहीं मिले। • अंतिम नतीजा: अप्रैल 2013 में ढहा; जमाकर्ताओं की वसूली अधूरी। 27. व्यापम भर्ती/परीक्षा घोटाला (2013) • आरोप: मध्य प्रदेश की भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में 1990 के दशक से जारी फ़र्ज़ी परीक्षार्थी, जाली उत्तर-पुस्तिकाएं और रिश्वत। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): परीक्षा बोर्ड के अधिकारी, बिचौलिए, उम्मीदवार, और मामलों में नामित राजनेता। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: राज्य की भर्ती और मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं। • साबित हुआ?: कई मामलों में हां; कुछ में सज़ाएं हो चुकी हैं। • अंतिम नतीजा: 2015 तक 2,000 से अधिक गिरफ़्तारियां; मुक़दमे जारी। 28. टाट्रा सेना ट्रक (2012) • आरोप: सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के ज़रिये टाट्रा ट्रक आपूर्ति में कथित बढ़ी क़ीमत और रिश्वत; एक कमज़ोर-स्रोत वाला अनुमान ~₹750 करोड़। तत्कालीन सेना प्रमुख ने ₹14 करोड़ की रिश्वत की पेशकश बताई। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): CBI के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के अधिकारी, बिचौलिए और डीलर। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सरकारी कंपनी के ज़रिये रक्षा ख़रीद। • साबित हुआ?: CBI ने 2012 में मामला दर्ज किया; देखे गए स्रोतों में कोई दोषसिद्धि नहीं मिली। • अंतिम नतीजा: 2020 में रक्षा मंत्रालय ने एक फ़र्म से कारोबार एक साल के लिए रोका; कोई फ़ैसला नहीं मिला। 29. अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर (2013, अंतरराष्ट्रीय) • आरोप: 12 हेलीकॉप्टरों के ₹3,546 करोड़ के सौदे में लगभग ₹360 करोड़ की कथित रिश्वत। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): इतालवी और भारतीय मामलों के अनुसार इतालवी मूल कंपनी के शीर्ष अधिकारी और बिचौलिए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: ₹3,546 करोड़ की सरकारी रक्षा ख़रीद (सौदा रद्द)। • साबित हुआ?: इटली में नहीं — अपील अदालत ने अधिकारियों को बरी किया; भारत में कार्यवाही जारी। • अंतिम नतीजा: जनवरी 2018 में इतालवी अपील अदालत ने पूर्व सीईओ और एक सहायक कंपनी प्रमुख को बरी किया; भारतीय मामले देखे गए स्रोतों में निपटे नहीं। 30. स्विस बैंक खाता सूची (2011, अंतरराष्ट्रीय) • आरोप: लीक हुई HSBC जिनेवा सूची में 1,195 भारतीयों के खाते थे जिनमें लगभग $4.1 अरब (2006–07) जमा था; फ़्रांस ने 2011 में भारत को 628 नाम दिए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): खाताधारक; देखे गए स्रोतों में केवल सूची के आधार पर आरोप स्थापित नहीं। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: संभावित कर चोरी; सीधा सरकारी धन नहीं। • साबित हुआ?: विदेशी खाता रखना अपने आप में अपराध नहीं; सबूत के लिए अघोषित आय चाहिए। • अंतिम नतीजा: काले धन की जांच; देखे गए स्रोतों में नतीजे का सार नहीं। 31. संसद में नोट-के-बदले-वोट (2008) • आरोप: 2008 के विश्वास मत के दौरान तीन विपक्षी सांसदों ने लोकसभा में नोटों की गड्डियां दिखाईं और आरोप लगाया कि सरकार के पक्ष में वोट देने या अनुपस्थित रहने के लिए उन्हें पैसे दिए गए। • ज़िम्मेदार (केवल भूमिका): दिल्ली अदालत के अनुसार केवल एक पूर्व दलीय सहयोगी पर भ्रष्टाचार के आरोप तय हुए; आरोपित राजनीतिक नेता डिस्चार्ज हुए। • सरकारी धन / सरकार की भूमिका: सार्वजनिक धन नहीं; यह सांसदों को कथित रिश्वत का मामला था। • साबित हुआ?: मुख्य आरोपियों के लिए नहीं — लोकसभा समिति ने आरोपित नेताओं को दोषी नहीं पाया, और अदालत ने कहा कि नोट दिखाने वाले सांसदों ने ख़रीद-फ़रोख़्त उजागर करने के लिए यह नाटक रचा था। • अंतिम नतीजा: नवंबर 2013 में दिल्ली की अदालत ने एक पूर्व दलीय नेता और तीन सांसदों को डिस्चार्ज किया; एक सहयोगी पर भ्रष्टाचार के आरोप तय हुए। ईमानदारी से यह सूची क्या दिखाती है: जिन मामलों में दोषसिद्धि हुई वे ज़्यादातर कागज़ी सबूत वाली धोखाधड़ी थे; सबसे बड़े आंकड़े (2G, कोलगेट, राष्ट्रमंडल खेलों की कुल रकम) ऑडिट या प्रेस के अनुमान थे, और अदालतों ने उनमें सबसे बड़े को नहीं माना। यह यह नहीं दिखाती कि कुछ हुआ ही नहीं — सिद्ध हुए कई मामलों में सार्वजनिक धन गया। और इन मामलों को फ़ैसले तक पहुंचने के दशकों मिले, हाल के मामलों को नहीं; साफ़ तुलना के लिए इंतज़ार करना होगा।
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