रायसकारात्मक राय
फ़र्ज़ी लाभार्थी अब नहीं, इंतज़ार भी नहीं
प्रकाशित: 15 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से एक दशक में ₹3.48 लाख करोड़ की बचत
दशकों तक भारत में कल्याणकारी भुगतान का मतलब था एक राशन कार्ड, राशन की कतार, और एक स्थानीय डीलर जो व्यावहारिक रूप से तय करता था कि हक़दार तक असल में कितना पहुंचेगा। सरकारी ख़ज़ाने से जो मंज़ूर होता था और जो किसी गरीब परिवार तक असल में पहुंचता था, उसके बीच का फ़ासला कोई मामूली चूक नहीं थी — यह एक व्यवस्थागत रिसाव था, जिसे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों ने वर्षों तक दर्ज किया, और जिसे 1947 में बेहतरीन इरादों के साथ बना एक नया, संसाधन-विहीन राज्य बढ़ने के बावजूद पूरी तरह पाट नहीं सका। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की असली उपलब्धि सुर्खियों वाला ₹3.48 लाख करोड़ का आंकड़ा नहीं है — बल्कि यह है कि यह फ़ासला कैसे पटा: आधार से सत्यापित, जन धन खाते से जुड़ा भुगतान, जिसने राशन डीलर की मनमानी की जगह ली और सरकारी खर्च में सब्सिडी की हिस्सेदारी को लगभग आधा — 16% से 9% — कर दिया। जिस परिवार को अब यह साबित नहीं करना पड़ता कि किसी काल्पनिक रिश्तेदार ने उनका PM-किसान भुगतान पहले ही ले लिया, उनके लिए यह कोई आंकड़ा नहीं है — यह बस समय पर पहुंचने वाला पैसा है। बड़ी तस्वीर भी अहम है: JAM ट्रिनिटी पर बना यह मॉडल अब दुनिया के दूसरे विकासशील देशों के लिए भी एक संदर्भ बन रहा है, जो ठीक उस रिसाव की समस्या से जूझ रहे हैं जिसे भारत की अपनी संस्थाओं ने सत्तर साल तक पूरी तरह हल नहीं किया था।
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