रायसकारात्मक राय
जो देश कभी गोला-बारूद तक राशन करता था, वह अब 80 अन्य देशों को हथियार देता है
प्रकाशित: 15 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: रक्षा निर्यात एक दशक में ₹686 करोड़ से रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ तक पहुंचा
आज़ादी के बाद के दशकों तक, भारत की रक्षा क्षमता निर्भरता की कहानी रही — ज़्यादातर सैन्य साज़ो-सामान आयात करना, और जिन युद्धों में असल में लड़ना पड़ा, उनमें अक्सर इस निर्भरता की वजह से देरी और कूटनीतिक शर्तों का सामना करना। एक ऐसा घरेलू रक्षा औद्योगिक आधार बनाना जो सिर्फ़ भारत की अपनी सेनाओं को ही नहीं बल्कि दूसरों को भी निर्यात कर सके, इस इतिहास के ज़्यादातर समय एक ऐसी महत्वाकांक्षा रही जो अपने ही लक्ष्यों से पीछे रह जाती थी।
इस पृष्ठभूमि के सामने, एक दशक में रक्षा निर्यात का ₹686 करोड़ से ₹23,622 करोड़ तक पहुंचना कोई मामूली बदलाव नहीं है — यह दिखाता है कि भारत का रक्षा निर्माण आधार अब सिर्फ़ घरेलू इस्तेमाल के लिए जुगाड़ करने भर का नहीं, बल्कि निर्यात-गुणवत्ता वाला उत्पादन करने में सक्षम है। ध्यान देने लायक बात यह है कि इसे कौन आगे बढ़ा रहा है: निजी कंपनियां और MSME, न कि सिर्फ़ पारंपरिक सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा दिग्गज, अब इस निर्यात आंकड़े का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं — यह उस सरकारी-एकाधिकार व्यवस्था से एक सार्थक रूप से अलग औद्योगिक आधार है जो दशकों तक आयात-निर्भरता को थोड़ा भी कम करने के लिए संघर्ष करती रही। जिस देश के सैन्य इतिहास में असली गोला-बारूद और साज़ो-सामान की कमी शामिल है, वह अब 80 से ज़्यादा देशों को बेचता है। यह ऐसी कहानी नहीं है जिसे अलंकरण की ज़रूरत हो।
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