रायमिश्रित राय
रसोई गैस की कतार का परपोता है गोबर का ठेका
प्रकाशित: 23 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: कैबिनेट ने खेत और गोबर के कचरे को स्वच्छ ईंधन में बदलने के लिए ₹23,731 करोड़ की गोबरधन योजना को मंज़ूरी दी
भारत की एक पूरी पीढ़ी को याद है कि 1970-80 के दशक में रसोई गैस का कनेक्शन पाना असल में क्या मायने रखता था — महीनों, कभी-कभी बरसों लंबी वेटिंग लिस्ट, और यह कमी इस बात से नहीं जुड़ी थी कि भारत को कितनी गैस चाहिए थी, बल्कि इस बात से कि वह खुद कितनी जुटा पाता था। गोबरधन योजना उसी याद का एक अजीब, चक्र-पूर्ण जवाब है — कोई नया गैस क्षेत्र नहीं, बल्कि गाय के गोबर, फसल की पराली और नगरपालिका के कचरे को, जो आज या तो फेंका जाता है या जला दिया जाता है, संपीड़ित बायोगैस (CBG) में बदलने की राष्ट्रीय योजना, साथ में तय खरीद-मूल्य और शहरी गैस नेटवर्क में 2028-29 तक 5% तक बढ़ने वाला अनिवार्य मिश्रण कोटा।
किसान परिवार के लिए प्रस्ताव सीधा है और अगर यह काम करे, तो मायने रखने वाला भी: उस कचरे का भुगतान करने वाला खरीदार जो आज कुछ नहीं कमाता और कभी-कभी खेत में जलाकर उसी परिवार के बच्चों की सांस में धुआं भर देता है। यह रहा सीधा, ज़मीनी तर्क। बड़ी तस्वीर वाला तर्क है ऊर्जा आत्मनिर्भरता — घर में बनी हर इकाई संपीड़ित बायोगैस, आयातित प्राकृतिक गैस या LPG की वह इकाई है जो भारत को अब खरीदनी नहीं पड़ेगी।
लेकिन ₹23,731 करोड़ और नौ साल का लक्ष्य एक योजना है, नतीजा नहीं, और यह एंट्री खुद इस बारे में ईमानदार है: अब तक किसी संयंत्र ने गैस नहीं दी, किसी किसान को भुगतान नहीं मिला, इस योजना की वजह से पराली का एक टन भी जलने से नहीं बचा। विचार सही है और जिस याद का यह जवाब है, वह असली है। यह नतीजा देगी या नहीं — यह 2027 का सवाल है, 2026 का नहीं।
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