रायमिश्रित राय
2014 के बाद: पांच प्रसंग, लोगों की मांग, और अदालतों व सरकारों ने क्या दिया
प्रकाशित: 13 अक्टू॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: 2014 के बाद भारत के प्रदर्शन और दंगे: कारण, मांगें और अदालती नतीजे
2014 के बाद के इन पांच प्रसंगों में कारण, मांगें, नेतृत्व (केवल भूमिकाएं), कौन हिरासत में रहा, रिहा हुआ या किन पर मुकदमा चला, मीडिया ने कैसे दिखाया और क्या नतीजा निकला, दर्ज है। तथ्य साथ की प्रविष्टि में स्रोत-सहित हैं। किसी व्यक्ति का नाम नहीं है, और यहां कुछ भी किसी समुदाय, दल या सरकार पर फैसला नहीं है। 'सत्यापित करें' वाली बातें प्रकाशन से पहले पुष्ट करनी होंगी।
1. जाट आरक्षण आंदोलन, हरियाणा (2016)
• क्या हुआ और क्यों: आरक्षण के लिए सामुदायिक आंदोलन 18 फरवरी 2016 को सोनीपत, रोहतक, भिवानी और कैथल में हिंसक हो गया। रिपोर्ट की गई मौतें लगभग 30 हैं (राज्य के पुलिस प्रमुख ने 30 बताईं); सेना तैनात हुई।
• मांगें: जाट समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण।
• नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): सामुदायिक संगठन और स्थानीय समितियां (सत्यापित करें)।
• हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: राज्य ने बाद में 2,027 आरोपियों वाले 223 मामले वापस लेने को मंज़ूरी दी।
• मीडिया कवरेज: इस मसौदे में स्रोत-सहित नहीं (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)।
• नतीजा: हरियाणा विधानसभा ने जाटों और चार अन्य समुदायों को आरक्षण देने वाला विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया; पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी। 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार कोटा व्यावहारिक रूप से पहुंच से बाहर था।
• सावधानी: बताई गई मौतें पुलिस और अख़बारी खबरों से हैं, किसी एक न्यायिक निष्कर्ष से नहीं।
2. भीमा कोरेगांव मामला: UAPA के तहत गिरफ्तारियां (2018 से)
• क्या हुआ और क्यों: 2018 की शुरुआत में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में एक स्मरणोत्सव के आसपास हुई हिंसा के बाद (सत्यापित करें) पुलिस ने अगस्त 2018 से कार्यकर्ताओं, वकीलों और शिक्षाविदों को ग़ैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया और प्रतिबंधित समूहों से संबंध का आरोप लगाया। आरोपी आरोपों से इनकार करते हैं।
• मांगें: आरोपियों और उनके परिवारों ने ज़मानत, निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई और रिहाई मांगी।
• नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): यह आंदोलन नहीं; आरोपी मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और शिक्षाविद हैं (केवल भूमिकाएं)।
• हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2018 से जेल में बंद दो आरोपियों को ज़मानत दी, यह कहते हुए कि केवल आरोपों की गंभीरता मुकदमे से पहले पांच साल से अधिक कैद का आधार नहीं हो सकती। मई 2024 में चार साल से अधिक कैद के बाद एक और आरोपी को ज़मानत दी और कहा कि मुकदमे में 370 गवाह हैं और वर्षों लग सकते हैं; छह सह-आरोपी पहले से ज़मानत पर थे। 2021 में एक आरोपी की हिरासत में मृत्यु हुई। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को शीघ्र आरोप तय करने का निर्देश दिया है।
• मीडिया कवरेज: इस मसौदे में स्रोत-सहित नहीं (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)।
• नतीजा: कोई फैसला नहीं; मिली ताज़ा रिपोर्टों (2024) तक सुनवाई शुरू नहीं हुई थी।
• सावधानी: आरोप सिद्ध नहीं हैं और मामला विचाराधीन है; यह प्रविष्टि अदालती आदेश दर्ज करती है, दोष या निर्दोषता नहीं। 2024 के बाद की स्थिति की पुष्टि नहीं है।
3. CAA-विरोधी प्रदर्शन (2019–2020)
• क्या हुआ और क्यों: दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता (संशोधन) अधिनियम तीन पड़ोसी देशों के कुछ गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता में तेज़ी देता है। प्रदर्शनकारियों को आशंका थी कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के साथ यह मुसलमानों को बाहर कर सकता है; सरकार ने कहा कि अधिनियम किसी की नागरिकता नहीं छीनता (सत्यापित करें)। देशभर में प्रदर्शन फैले, कुछ हिंसक हुए।
• मांगें: अधिनियम की वापसी और राष्ट्रीय नागरिक या जनसंख्या रजिस्टर न बनाना।
• नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): कोई एक नेतृत्व नहीं; छात्र संगठन, स्थानीय धरने और नागरिक संगठन (सत्यापित करें)।
• हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: मौतों की रिपोर्ट अलग हैं: अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग 20 (ट्रिब्यून) और कुल 25 से अधिक (द क्विंट)। राष्ट्रीय गिरफ्तारी-संख्या नहीं मिली। 22 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम और जनसंख्या रजिस्टर पर रोक से इनकार किया और कहा कि पांच-जजों की पीठ लग सकती है। 11 मार्च 2024 को जब सरकार ने नागरिकता (संशोधन) नियम अधिसूचित किए, तब करीब 237 याचिकाएं दिसंबर 2019 से लंबित थीं; अदालत ने रोक-आवेदनों पर नोटिस जारी किया।
• मीडिया कवरेज: इस मसौदे में स्रोत-सहित नहीं (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)।
• नतीजा: अधिनियम कायम है और 2024 के नियमों से लागू है; मिली ताज़ा रिपोर्ट तक संवैधानिक चुनौती लंबित थी।
• सावधानी: मौतों के आंकड़े अख़बारी गिनती हैं जो संस्था और तारीख़ के अनुसार अलग हैं।
4. उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे (फरवरी 2020)
• क्या हुआ और क्यों: फरवरी 2020 में CAA-विरोधी प्रदर्शनों और जवाबी प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में अधिकांश रिपोर्टों के अनुसार 53 लोग मारे गए; सैकड़ों घायल हुए।
• मांगें: मांग-पत्र वाला प्रदर्शन नहीं; परिवारों ने न्याय और मुआवज़ा मांगा।
• नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): दंगे पर लागू नहीं। एक अलग साज़िश-मामले में पहले के प्रदर्शनों के आयोजकों को आरोपी बनाया गया है (केवल भूमिकाएं)।
• हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: लगभग 2,600 गिरफ्तारियां बताई गईं। 700 से अधिक मामलों के एक विश्लेषण में करीब चार साल बाद 183 बरी और 75 आरोपमुक्त मिले; बीबीसी हिंदी की समीक्षा में निर्णित मामलों में 80% से अधिक बरी या आरोपमुक्त हुए। बड़े साज़िश-मामले में 21 आरोपियों पर आरोप तय हुए और रिपोर्ट के समय 12 बिना सुनवाई हिरासत में थे। अदालतों ने कमज़ोर साक्ष्य, विरोधाभासी गवाह, गवाहों के मुकरने और जांच की खामियों का हवाला दिया; कुछ मामलों में सज़ा या आरोप भी तय हुए।
• मीडिया कवरेज: मीडिया की प्रस्तुति बंटी रही: पुलिस इसे पूर्व-नियोजित साज़िश बताती है, जबकि आलोचक इसे मुसलमानों पर लक्षित हमला कहते हैं और पुलिस की चूक का आरोप लगाते हैं।
• नतीजा: अधिकांश निर्णित मामले बिना सज़ा खत्म हुए; मिली रिपोर्टों में साज़िश-मामला अब भी सुनवाई में है।
• सावधानी: दोनों विवरण विवादित हैं; बरी होने की दर केवल निर्णित मामलों की है और स्रोतों में तारीख़ें अलग हैं।
5. किसान आंदोलन और कृषि क़ानून (2020–2021)
• क्या हुआ और क्यों: सितंबर 2020 में पारित तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में किसान लगभग एक साल दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे (सत्यापित करें)। रिपोर्टों के अनुसार उनकी आशंका फसल के सुनिश्चित दाम और बाज़ार सुरक्षा खोने की थी।
• मांगें: तीनों क़ानूनों की वापसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की क़ानूनी गारंटी, पुलिस मामलों की वापसी, मृतकों के परिवारों को मुआवज़ा और पराली जलाने को अपराध-मुक्त करना।
• नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): किसान संगठनों का गठबंधन, संयुक्त किसान मोर्चा।
• हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: केंद्र किसानों पर पुलिस मामले वापस लेने पर सहमत हुआ; उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने मुआवज़े पर सैद्धांतिक सहमति दी। उपयोग किए गए स्रोतों में गिरफ्तारियों या मौतों की कोई राष्ट्रीय गिनती नहीं मिली।
• मीडिया कवरेज: इस मसौदे में स्रोत-सहित नहीं (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)।
• नतीजा: वापसी की घोषणा 19 नवंबर 2021 को हुई और संसद ने 29 नवंबर को पारित की। कृषि सचिव के 9 दिसंबर के पत्र में MSP समिति, मामलों की वापसी और पराली जलाने को अपराध-मुक्त करने का वादा था, और किसान 11 दिसंबर तक स्थल छोड़ गए। किसान संगठन ने फरवरी 2022 में कहा कि 50 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं हुई।
• सावधानी: वादे अधूरे रहने का दावा संगठन का अपना है, जिसे एक पैरोकार मीडिया ने छापा; समिति और मुआवज़े की आधिकारिक स्थिति यहां सत्यापित नहीं है।