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2014 से पहले: चार प्रसंग, लोगों की मांग, और अदालतों व संसद ने क्या दिया

प्रकाशित: 13 अक्टू॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: 2014 से पहले भारत के दंगे और प्रदर्शन: कारण, मांगें और अदालती नतीजे

2014 से पहले के इन चार प्रसंगों में कारण, मांगें, नेतृत्व (केवल भूमिकाएं), कौन हिरासत में रहा या किन पर मुकदमा चला, मीडिया ने कैसे दिखाया और क्या नतीजा निकला, दर्ज है। तथ्य साथ की प्रविष्टि में स्रोत-सहित हैं। किसी व्यक्ति का नाम नहीं है, और यहां कुछ भी किसी समुदाय, दल या सरकार पर फैसला नहीं है। 'सत्यापित करें' वाली बातें प्रकाशन से पहले पुष्ट करनी होंगी। 1. गुजरात दंगे (2002) • क्या हुआ और क्यों: 27 फरवरी 2002 को गोधरा में ट्रेन के डिब्बे में आग लगने के बाद पूरे गुजरात में हिंसा फैली और हफ्तों चली। राज्यभर में मौतों का आंकड़ा तय नहीं है: 2005 में संसद को दिया गया उत्तर आम तौर पर 1,044 मौतें बताया जाता है (सत्यापित करें), जबकि अन्य अनुमान लगभग 2,000 तक जाते हैं। • मांगें: पीड़ितों और नागरिक संगठनों ने राज्य पुलिस से बाहर स्वतंत्र जांच और अभियोजन, राहत और पुनर्वास मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल (SIT) बनाया और प्रमुख मामलों की निगरानी की। • नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): कोई आंदोलन-नेतृत्व नहीं; लंबा अभियान पीड़ितों, वकीलों और मानवाधिकार संगठनों ने चलाया। • हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: गुलबर्ग सोसायटी (69 मौतें): 2016 में विशेष अदालत ने 24 को दोषी और 36 को बरी किया, 11 को उम्रकैद। नरोदा पाटिया: 2012 में 32 दोषी, 29 बरी; 2018 में हाई कोर्ट ने उसमें दोषी ठहराए गए एक पूर्व राज्य मंत्री को साक्ष्य के अभाव में बरी किया। नरोदा गाम (11 मौतें): 2023 में सभी 67 आरोपी बरी। 2013 में सुप्रीम कोर्ट-नियुक्त पैनल ने अपर्याप्त साक्ष्य का हवाला देकर तत्कालीन राज्य मुख्यमंत्री पर मुकदमा चलाने से इनकार किया। • मीडिया कवरेज: 24 घंटे के टीवी समाचार चैनलों पर सीधे प्रसारित शुरुआती बड़े दंगों में से एक (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)। • नतीजा: 14 या अधिक वर्षों बाद आंशिक सज़ाएं; कई बड़े मामले बरी होने पर खत्म हुए। • सावधानी: मौतों के आंकड़े स्रोत-अनुसार अलग हैं; संसद-उत्तर और 2,000 के अनुमान का यहां मिलान नहीं किया गया है। 2. भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन और लोकपाल क़ानून (2011–2013, नियुक्ति 2019) • क्या हुआ और क्यों: 2010–11 के आसपास घोटालों की कड़ी पर जनाक्रोश से अप्रैल 2011 से जन-अनशन और रैलियां शुरू हुईं। • मांगें: एक स्वतंत्र लोकपाल, जो शीर्ष स्तर तक के लोक सेवकों की जांच और अभियोजन कर सके। • नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): सार्वजनिक अनशन पर बैठे एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्हें नागरिक समाज के एक मुख्य समूह का समर्थन था। • हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: मिले स्रोतों में लंबी कैद दर्ज नहीं है; अगस्त 2011 में मुख्य कार्यकर्ता की संक्षिप्त हिरासत व्यापक रूप से बताई जाती है (सत्यापित करें)। कोई अदालती नतीजा शामिल नहीं। • मीडिया कवरेज: टाइम पत्रिका ने इन प्रदर्शनों को 2011 की शीर्ष 10 खबरों में गिना; टीवी कवरेज लगभग लगातार रहा (सत्यापित करें)। • नतीजा: संसद ने दिसंबर 2013 में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पारित किया। पहला लोकपाल सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद मार्च 2019 में ही नियुक्त हुआ, और देरी पर कार्यकर्ता ने जनवरी 2019 में फिर अनशन किया। • सावधानी: क़ानून का पारित होना और नियुक्ति की देरी अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में पड़ती है; देरी नीचे दिए स्रोतों में दर्ज है। 3. दिसंबर 2012 सामूहिक बलात्कार के बाद दिल्ली के प्रदर्शन • क्या हुआ और क्यों: 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में एक बस में 23 वर्षीय मेडिकल छात्रा से सामूहिक बलात्कार के बाद जनाक्रोश उमड़ा। • मांगें: तेज़ सुनवाई, यौन हिंसा पर कड़ी सज़ा, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान और पुलिस की जवाबदेही। • नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): किसी एक संगठन ने नेतृत्व नहीं किया; छात्र, महिला संगठन और नागरिक आगे रहे (सत्यापित करें)। • हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: मिले स्रोतों में सामूहिक गिरफ्तारी दर्ज नहीं; प्रदर्शनकारियों पर पुलिस बल-प्रयोग अन्यत्र बताया गया है (सत्यापित करें)। • मीडिया कवरेज: राष्ट्रीय स्तर पर लगातार कवरेज; मिले स्रोत प्रदर्शनों का विवरण संक्षेप में देते हैं। • नतीजा: 23 दिसंबर 2012 को पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनी और 23 जनवरी 2013 को रिपोर्ट दी। 3 फरवरी 2013 को अध्यादेश आया और 2 अप्रैल 2013 को आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 को स्वीकृति मिली, यानी घटना के लगभग चार महीने बाद। सभी सिफारिशें नहीं मानी गईं; वैवाहिक बलात्कार अपराध नहीं बना। • सावधानी: यह तेज़ विधायी नतीजे वाला प्रदर्शन है, दंगा नहीं। 4. मुज़फ़्फ़रनगर और शामली दंगे (2013) • क्या हुआ और क्यों: 2013 में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िलों में सांप्रदायिक हिंसा, कवाल गांव में एक हत्या के बाद तनाव से शुरू हुई। 60 से अधिक लोग मारे गए और 40,000 से 50,000 विस्थापित हुए। • मांगें: राहत शिविर, मुआवज़ा, विस्थापितों की वापसी और न्याय। • नेतृत्व (केवल भूमिकाएं): मिले स्रोतों में किसी आंदोलन-नेतृत्व की पहचान नहीं। • हिरासत, रिहाई और अदालती नतीजे: एक रिपोर्ट में लगभग 6,000 मामले और 1,480 गिरफ्तारियां गिनी गईं; दूसरी के अनुसार 510 दंगा-मामलों में 175 में आरोपपत्र दाखिल हुए। 2021 तक 97 मामलों के 1,117 आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हुए और एक मामले में सात को सज़ा हुई (2019 में उम्रकैद)। 2024 में भी गवाह मुकरने से बरी होना जारी रहा। एक अदालत ने राज्य को कुछ राजनीतिक नेताओं पर मामले वापस लेने की अनुमति भी दी। • मीडिया कवरेज: इस मसौदे में स्रोत-सहित नहीं (प्रकाशन से पहले सत्यापित करें)। • नतीजा: बहुत कम सज़ाएं; विस्थापितों के पुनर्वास का ब्योरा उपयोग किए स्रोतों में नहीं है (सत्यापित करें)। • सावधानी: आंकड़े अलग-अलग तारीख़ों की खबरों से हैं और एक मौजूदा कुल नहीं बनाते।
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