रायमिश्रित राय
2019 से पहले, दिल्ली से किसी किसान को सीधा नकद नहीं मिलता था। अब 9 करोड़ परिवारों को मिलता है — ज़्यादातर को, वैसे।
प्रकाशित: 15 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: पीएम-किसान ने किसानों को ₹4.27 लाख करोड़ की सीधी नकद सहायता दी
आज़ाद भारत में जब से कृषि नीति रही है, किसान सहायता का मतलब ज़्यादातर इनपुट पर सब्सिडी रहा है — खाद, बिजली, कर्ज़ — ऐसी व्यवस्थाओं से गुज़रते हुए जिनमें असल किसान तक पहुंचने से पहले बिचौलिए के लिए काफ़ी गुंजाइश बची रहती थी। किसान के अपने बैंक खाते में सीधे, बिना बिचौलिए के, राष्ट्रीय पैमाने पर नकद ट्रांसफर एक वाकई अलग तरीका है, और 2019 से PM-किसान का 9 करोड़ से ज़्यादा परिवारों को ₹4.27 लाख करोड़ देना, वही तरीका है जो आज़ाद भारत की कृषि नीति ने पहले कभी इस पैमाने पर नहीं आज़माया।
यहां ईमानदार टिप्पणियां ठोस और दर्ज हैं, अस्पष्ट नहीं: एक RTI जवाब ने पुष्टि की कि लगभग 58 लाख ऐसे लोगों को ₹2,589 करोड़ का भुगतान हुआ जो पात्र ही नहीं होने चाहिए थे, जिनमें योजना के अपने नियमों से स्पष्ट रूप से बाहर रखे गए आयकरदाता भी शामिल थे — यह एक असली प्रशासनिक चूक है, कोई गोलमाल आंकड़ा नहीं। तय ₹6,000 सालाना राशि को भी 2019 से महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ाया गया, जिससे 2023 तक इसका वास्तविक मूल्य चुपचाप लगभग एक-पांचवां घट गया। और क्योंकि योजना भूमि रिकॉर्ड से जुड़ी है, भूमिहीन और बटाईदार किसान परिवार — एक बड़ी आबादी — जानबूझकर बाहर रखे गए हैं, चूक से नहीं। इससे यह बुनियादी तथ्य नहीं मिटता कि किसानों तक सीधे नकद पहुंचाने का, हर पिछली सब्सिडी का बड़ा हिस्सा सोख लेने वाले बिचौलियों को दरकिनार करने वाला एक तरीका अब मौजूद है और नौ अंकों में परिवारों तक पहुंचता है। इस तरीके की असली पहुंच और इसकी असली, ठोस खामियां — दोनों एक ही हिसाब में आनी चाहिए।
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