एआईसीटीई का भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) प्रभाग प्राचीन विज्ञान अनुसंधान को फंड करता है — बजट खर्च कम, वैज्ञानिकता पर सवाल
प्रकाशित: 23 सित॰ 2026
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IKS प्रभाग वार्षिक बजट (2025-26)
IKS सामग्री अपनाने वाले उच्च शिक्षा संस्थान
अक्टूबर 2020 (स्थापना) से पहले
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नवीनतम रिपोर्टिंग के अनुसार
8,000 से अधिक
स्थापित समर्पित IKS अनुसंधान केंद्र
2020
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IKS प्रभाग वास्तविक है, सरकार द्वारा वित्तपोषित है, और इसकी जड़ें सचमुच ठोस प्राचीन विज्ञान में हैं — बौधायन का ज्यामितीय प्रमेय, आर्यभट्ट का दशमलव तंत्र, ब्रह्मगुप्त का शून्य, सुश्रुत की शल्य-चिकित्सा — पर हर लोकप्रिय दावा उतना सटीक नहीं जितना अक्सर कहा जाता है (जैसे यह कहना कि आर्यभट्ट ने शून्य "खोजा", या भारत ने न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण का नियम खोज लिया था)। कार्यक्रम ने ठोस परिणाम भी दिए हैं — प्रतिस्पर्धी अनुदान, 32 केंद्र, अनिवार्य क्रेडिट-कोर्स, हजारों इंटर्नशिप — लेकिन यह असमान भी है: 2025-26 का आवंटित बजट का लगभग एक-चौथाई ही खर्च हुआ, और नामित वैज्ञानिकों ने विशिष्ट परियोजनाओं पर वैज्ञानिक कठोरता की कमी दर्ज की है।
IKS प्रभाग वास्तव में क्या है, और उसने क्या फंड किया है
IKS प्रभाग अक्टूबर 2020 में शिक्षा मंत्रालय के अधीन AICTE के एक "इनोवेशन सेल" के रूप में स्थापित किया गया, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के भारतीय ज्ञान परंपराओं को पाठ्यक्रम में एकीकृत करने के प्रावधान का हिस्सा है (PIB प्रेस विज्ञप्ति, pib.gov.in)। इसका बजट 2022-23 में दोगुना होकर ₹20 करोड़ हुआ; 2025-26 के लिए ₹50 करोड़ आवंटित किया गया, लेकिन संशोधित अनुमान के अनुसार उस वर्ष वास्तव में केवल ₹12.45 करोड़ ही खर्च हुआ — बजट का लगभग एक-चौथाई — जिसके बाद 2026-27 के लिए आवंटन घटाकर ₹35 करोड़ कर दिया गया (Careers360 का शिक्षा-बजट 2026 विश्लेषण)। IKS प्रभाग/AICTE की अपनी रिपोर्टिंग के अनुसार ठोस परिणाम इस प्रकार हैं: 8,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम में IKS सामग्री शामिल करना शुरू किया है; 32 समर्पित IKS अनुसंधान केंद्र स्थापित किए गए हैं; धातुकर्म, नगर नियोजन, जल प्रबंधन और रसायनशास्त्र जैसे क्षेत्रों में 75 अंतर-विषयक अनुसंधान परियोजनाएं वित्तपोषित की गई हैं; प्रतिस्पर्धी शोध अनुदान प्रति परियोजना ₹5-25 लाख (दो वर्षों में) दिए जाते हैं; लगभग 5,200 छात्र इंटर्नशिप दी गई हैं; और UGC ने उच्च शिक्षा के 5% क्रेडिट IKS-संबंधी सामग्री से जोड़ने की सिफारिश की है, जबकि AICTE ने पहले वर्ष के इंजीनियरिंग छात्रों के लिए एक IKS पाठ्यक्रम अनिवार्य किया है।
पहल के पीछे असली प्राचीन विज्ञान — तथ्यों को सही ढंग से समझना
IKS जिन पारंपरिक ज्ञान-क्षेत्रों (गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद) की ओर इशारा करता है, उनमें वाकई दस्तावेज़ीकृत, मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा मान्यता-प्राप्त उपलब्धियां हैं — हालांकि इनके लोकप्रिय संस्करण अक्सर मूल स्रोतों से आगे बढ़कर दावा करते हैं। चार उदाहरण, गणित और चिकित्सा-इतिहास की मुख्यधारा जितनी सटीकता के साथ: बौधायन की शुल्बसूत्र (लगभग 800 ईसा पूर्व), जो यज्ञ-वेदी निर्माण के लिए एक ज्यामिति ग्रंथ है, में समकोण त्रिभुज की भुजाओं के बीच उस संबंध का स्पष्ट कथन मिलता है जिसे आज "पाइथागोरस प्रमेय" कहा जाता है, साथ ही पाइथागोरस त्रिक की एक सूची भी — यह पाइथागोरस (लगभग 570-495 ईसा पूर्व, ग्रीस) से सदियों पहले की बात है। गणित-इतिहासकार (सेंट एंड्रयूज़ विश्वविद्यालय का MacTutor History of Mathematics संग्रह) इसे "दुनिया में सबसे पहले" के बजाय एक स्वतंत्र प्राचीन खोज मानते हैं, क्योंकि प्राचीन बेबीलोनियों को भी पाइथागोरस त्रिक का समतुल्य गणितीय ज्ञान कम से कम 1800 ईसा पूर्व (प्लिम्पटन 322 पट्टिका) तक था, और कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शुल्बसूत्र की ज्यामिति स्वयं मेसोपोटामिया की गणितीय परंपराओं से प्रभावित हो सकती है। ईमानदार प्रस्तुति यह है कि यह "कई स्वतंत्र प्राचीन परंपराओं में से एक" है, न कि "दुनिया में सबसे पहले"। आर्यभट्ट (476-550 ईस्वी) ने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में पाई का सन्निकटन (3.1416, जिसे उन्होंने स्वयं "आसन्न" यानी अनुमानित मूल्य बताया, सटीक नहीं) दिया, दशमलव स्थानीय-मान प्रणाली के प्रयोग को प्रदर्शित किया, और पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूर्णन को तारों की आभासी गति के कारण के रूप में वर्णित किया। उन्होंने सूर्यकेंद्रीयता (heliocentrism) की खोज नहीं की, न ही शून्य को एक स्वतंत्र गणितीय अवधारणा के रूप में "आविष्कृत" किया — उनकी स्थानीय-मान प्रणाली में शून्य का प्रयोगात्मक उपयोग था, पर शून्य को अपने नियमों वाली एक संख्या के रूप में स्पष्ट परिभाषित करने का श्रेय एक बाद की उपलब्धि है। शून्य को केवल स्थान-सूचक अंक नहीं बल्कि पूर्ण संख्या मानकर उसके लिए जोड़-घटाव के नियम देने का श्रेय सबसे सटीक रूप से ब्रह्मगुप्त की ब्रह्मस्फुटसिद्धांत (628 ईस्वी) को जाता है, जो शून्य के पहले से प्रचलित स्थान-सूचक संकेतों (जैसे बख्शाली पांडुलिपि में) पर आधारित थी। इस विशिष्ट वैचारिक छलांग का श्रेय आर्यभट्ट को देना — जैसा लोकप्रिय विवरणों में अक्सर होता है — उनके दस्तावेज़ीकृत योगदान से आगे बढ़कर दावा करना है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता प्राचीन भारतीय चिकित्सा और शल्य-चिकित्सा के मूल ग्रंथ हैं। सुश्रुत द्वारा वर्णित माथे की त्वचा से नाक पुनर्निर्माण (forehead-flap rhinoplasty) तकनीक को मुख्यधारा के चिकित्सा-इतिहासकार (सहकर्मी-समीक्षित चिकित्सा-इतिहास साहित्य में प्रकाशित) आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी का वास्तविक पूर्वगामी मानते हैं; 18वीं सदी में भारत में मौजूद ब्रिटिश सर्जनों ने इस तकनीक को दस्तावेज़ किया और यूरोप ले गए, जहां यह आधुनिक शल्य-साहित्य में शामिल हुई। एक दावा जिसे हम जानबूझकर शामिल नहीं कर रहे क्योंकि वह तथ्यों पर खरा नहीं उतरता: यह लोकप्रिय दावा कि "प्राचीन भारत ने न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण खोज लिया था"। ब्रह्मगुप्त के ग्रंथों में जो वास्तव में वर्णित है वह एक कहीं अधिक सीमित विचार है — कि पृथ्वी में वस्तुओं को अपनी ओर खींचने का एक गुण है — न कि न्यूटन के सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के व्युत्क्रम-वर्ग नियम जैसा गणितीय सूत्रीकरण, जो न्यूटन का विशिष्ट और अलग योगदान है। हम वही रिपोर्ट करते हैं जो प्राचीन ग्रंथ वास्तव में दर्ज करते हैं, न कि उस पर चढ़ाया गया आधुनिक अतिरंजित आवरण।
जहां वैज्ञानिक कठोरता कमजोर पड़ती है — दर्ज मामले
उसी क्षेत्र में, जहां वास्तविक अनुसंधान होता है, वहीं विशिष्ट, दस्तावेज़ीकृत विवाद भी हैं। SUTRA-PIC नाम की गोमूत्र-एंटीवायरल शोध श्रृंखला पर चिकित्सक डॉ. सिरियाक एबी फिलिप्स ("द लिवर डॉक") ने ACS Publications और Springer Nature जैसी प्रमुख पत्रिकाओं में औपचारिक शिकायतें दर्ज कीं, जिसके बाद इन पत्रिकाओं ने संबंधित शोधपत्रों की समीक्षा शुरू की; IIT रुड़की के एक गोमूत्र-एंटीवायरल अध्ययन ने भी शोध-सत्यनिष्ठा से जुड़े सवाल खड़े किए। IIT मंडी के 2026 के "माइंड, ब्रेन एंड कॉन्शसनेस" सम्मेलन में वास्तविक न्यूरोसाइंस शोध को "पुनर्जन्म विज्ञान" और "ऊर्जा चक्रों" पर सत्रों के साथ जोड़ा गया। एक "क्वांटम इमोशन थ्योरी" पर 14 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं, लेकिन आलोचकों के अनुसार इसमें कोई परीक्षण-योग्य तंत्र नहीं दिया गया। आयुर्वेद पाठ्यक्रम में शामिल एक ज्योतिष पाठ्यक्रम का ब्रेकथ्रू साइंस सोसाइटी और ऑल इंडिया पीपल्स साइंस नेटवर्क ने सार्वजनिक रूप से विरोध किया, यह कहते हुए कि ज्योतिष "मान्यताओं का एक ऐसा समूह है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है", और चेतावनी दी कि NEP के IKS प्रावधान का उपयोग इसे शैक्षणिक रूप से उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। यह स्पष्ट रहे कि ये नामित वैज्ञानिकों और संगठनों की विशिष्ट परियोजनाओं पर दर्ज आलोचनाएं हैं, समूचे IKS पोर्टफोलियो पर कोई सर्वव्यापी फैसला नहीं — वही रिपोर्टिंग (Scroll.in) यह भी बताती है कि संस्कृत कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान और पारंपरिक औषध-विज्ञान जैसे वास्तविक, गैर-विवादित IKS-संबद्ध कार्य भी मौजूद हैं।
व्यष्टि और समष्टि: एक अनुदान, एक कोर्स-क्रेडिट, और यहां "आत्मनिर्भरता" का अर्थ
व्यष्टि स्तर पर: एक व्यक्तिगत शोधकर्ता के लिए, IKS वित्तपोषण ठोस रूप से एक प्रतिस्पर्धी प्रस्ताव-प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन किया जा सकने वाला ₹5-25 लाख का दो-वर्षीय अनुदान है; एक इंजीनियरिंग छात्र के लिए, यह अब स्नातक होने हेतु पूरा करना अनिवार्य एक क्रेडिट-आधारित पाठ्यक्रम है — उनकी साप्ताहिक समय-सारणी में एक वास्तविक बदलाव, केवल एक नीति-वक्तव्य नहीं। समष्टि स्तर पर: IKS प्रभाग का अपना कथित लक्ष्य भारत के अपने पारंपरिक ज्ञान-क्षेत्रों के मूल्यांकन में गैर-भारतीय ढांचों पर निर्भरता घटाना है — यानी ज्ञान-उत्पादन में आत्मनिर्भरता का तर्क — लेकिन यह IKS प्रभाग का अपना कथित लक्ष्य है, न कि कोई परिणाम जिसे यह प्रविष्टि सत्यापित कर सके। दर्ज और विश्वसनीय वास्तविकता यह है: एक ऐसा कार्यक्रम जो कठोर अंतर-विषयक शोध और ऐसी विशिष्ट परियोजनाओं दोनों को फंड करता है जिन्हें नामित वैज्ञानिकों ने सार्वजनिक रूप से बुनियादी वैज्ञानिक मानकों पर खरा न उतरने वाला दिखाया है, और जिसका अपना बजट-निष्पादन अनियमित रहा है। हम कथित लक्ष्य को उसके अपने शब्दों में और दर्ज तथ्यों को उनकी वास्तविकता में रिपोर्ट करते हैं, न तो "दबाए गए प्राचीन विज्ञान को पुनर्जीवित करने" के दावे का समर्थन करते हुए, न ही पूरे क्षेत्र को खारिज करते हुए।
स्रोत
- Indian Knowledge System holds solutions to many of the world's challenges- Shri Dharmendra PradhanPress Information Bureau, Government of IndiaOfficial / primary source
- Indian Knowledge Systems (IKS) — official division siteAICTE — Indian Knowledge Systems DivisionOfficial / primary source
- Budget 2026: Higher education outlay up 11%; IKS allocation cutCareers360Reputable media
- Indian Knowledge Systems, 2020: Reviving Ancient Wisdom For Modern ChallengesIMPRI Impact and Policy Research InstituteSecondary source
- Can the Indian Knowledge Systems be defended from pseudoscience?Scroll.inReputable media
- When research money is scarce, should it fund cow urine papers?NewslaundryReputable media
- Astrology course in Ayurveda curriculum 'ridiculous'; science group urges people to opposeCareers360Reputable media
- Indian Mathematics: Sulba SutrasMacTutor History of Mathematics, University of St AndrewsSecondary source
- Brahmagupta (598-670)MacTutor History of Mathematics, University of St AndrewsSecondary source
- Aryabhata I — Achievements, Mathematics, Works, BiographyEncyclopaedia BritannicaSecondary source
- Sushruta: father of plastic surgeryPubMed / National Library of MedicineSecondary source
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