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तुलना

जनसंख्या के अनुपात में ओलंपिक पदक: भारत बनाम अन्य देश (2012–2024)

जनसंख्या प्रति ओलंपिक पदक (संचयी, ग्रीष्मकालीन ओलंपिक 2012–2024)

भारत
6,84,79,505 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 21 पदक)
चीन
41,25,760 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 342 पदक)
अमेरिका
7,22,866 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 466 पदक)
फ़िजी
2,31,036 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 4 पदक)
न्यूज़ीलैंड
73,239 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 71 पदक)
जमैका
72,815 व्यक्ति प्रति पदक (कुल 39 पदक)
भारत ने पिछले चार ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में — लंदन 2012 (6 पदक), रियो 2016 (2), टोक्यो 2020 (7, भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन) और पैरिस 2024 (6) — मिलाकर कुल 21 पदक जीते। यहाँ एक ही आयोजन के बजाय चार खेलों का संचयी आंकड़ा लिया गया है, क्योंकि किसी एक आयोजन का नतीजा मुट्ठी भर व्यक्तिगत प्रदर्शनों पर निर्भर कर सकता है। भारत की 2023 की लगभग 143.8 करोड़ (1.438 अरब) की आबादी (विश्व बैंक) के अनुपात में यह लगभग हर 68,479,505 (6.85 करोड़) व्यक्तियों पर एक पदक बैठता है — किसी भी प्रमुख खेल-राष्ट्र में सबसे कमज़ोर अनुपात। यह तुलना जानबूझकर कुल पदक-संख्या के बजाय 'जनसंख्या प्रति पदक' दिखाती है, क्योंकि कुल संख्या बड़े देशों के पक्ष में झुकी होती है और यह नहीं बताती कि किसी देश की खेल-व्यवस्था वास्तव में अपनी जनसंख्या तक कितनी गहराई तक पहुँचती है — यही तर्क इस साइट पर जीडीपी और आय के आंकड़ों पर भी लागू होता है, और यह यहाँ भी उतना ही ज़रूरी है। यह अंतर मामूली नहीं है। जमैका (28.4 लाख की आबादी) ने इन्हीं चार खेलों में 39 पदक जीते — यानी लगभग हर 72,815 व्यक्तियों पर एक पदक। न्यूज़ीलैंड (52 लाख आबादी) ने 71 पदक जीते — लगभग हर 73,239 व्यक्तियों पर एक। फ़िजी (9.24 लाख आबादी, सिर्फ 4 पदक, सभी रग्बी सेवन्स की टीम स्पर्धा में) भी प्रति व्यक्ति भारत से लगभग 296 गुना बेहतर है। सिर्फ जनसंख्या के आकार से भी भारत का यह आंकड़ा नहीं समझाया जा सकता — चीन, जिसकी आबादी भारत के लगभग बराबर (2% के अंतर के भीतर) है, ने इसी अवधि में 342 पदक जीते, यानी हर 41,25,760 व्यक्तियों पर एक — भारत के अनुपात से लगभग 17 गुना बेहतर। अमेरिका (33.68 करोड़ आबादी, 466 पदक) प्रति व्यक्ति भारत से लगभग 95 गुना बेहतर प्रदर्शन करता है। सूक्ष्म स्तर पर: भारत के किसी युवा खिलाड़ी के लिए यह अनुपात कोचिंग, खेल-अवसंरचना और किसी छोटे ज़िले तक पहुँचने वाली स्पष्ट प्रतिभा-खोज प्रणाली की वास्तविक कमी को दर्शाता है — जो पहुँच 140 करोड़ की जनसंख्या के आधार पर सहज लगनी चाहिए थी, वह अब भी अपवाद बनी हुई है, नियम नहीं। स्थूल स्तर पर: ओलंपिक पदक-तालिका किसी देश की खेल-क्षमता और सॉफ़्ट पावर का एक व्यापक रूप से देखा जाने वाला, हालांकि अपूर्ण, संकेतक है, और यह प्रति-व्यक्ति अंतर — जो भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि के बावजूद लगभग जैसा-तैसा बना हुआ है — बताता है कि यह अंतर अकेले आर्थिक आकार से हल नहीं होता; जीडीपी की रैंकिंग के विपरीत, यह ऐसी रैंकिंग नहीं है जो सकल आर्थिक उत्पादन की बेहतर फंडिंग से खुद-ब-खुद ठीक हो जाए।

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