रायमिश्रित राय
वही सब्ज़ी संकट, साल में दो बार: कभी घर का बजट बिगड़ता है, कभी किसान बर्बाद होता है
प्रकाशित: 23 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: प्याज़ और टमाटर की कीमतें अब भी उपभोक्ता को झकझोरने वाले उछाल से किसान को तबाह करने वाली गिरावट के बीच झूलती हैं
यह याद रखने लायक है कि "खाद्य सुरक्षा" का मतलब भारत में 1960 के दशक तक क्या था: एक ऐसा देश जो PL-480 योजना के तहत अमेरिका से गेहूं खरीदता था, दूसरे देश की फसल और कभी-कभी उसके राजनीतिक मूड पर निर्भर, जिसे खुलेआम "शिप-टू-माउथ" अस्तित्व कहा जाता था। वह भारत अब नहीं रहा। आज की समस्या — प्याज़ और टमाटर की कीमतों का ऐसे उछाल और गिरावट के बीच झूलना जो कभी परिवार का किराना बजट बिगाड़ दे, कभी उसी फसल उगाने वाले किसान को बर्बाद कर दे — एक अलग, लगभग उल्टी समस्या है: बहुत कम अनाज नहीं, बल्कि इतनी नाज़ुक आपूर्ति श्रृंखला कि अच्छी और बुरी फसल के बीच का फर्क संभाला ही नहीं जा सकता।
इस कहानी का ज़मीनी रूप पिछले एक साल में दो बार सामने आया। नवंबर 2025 में साइक्लोन मोंथा ने टमाटर उगाने वाले राज्यों को तबाह कर दिया, और जो टमाटर एक साल पहले ₹48 किलो था, वह ₹80 तक पहुंच गया — एक ऐसा बोझ जो हर घर दाल या सब्ज़ी बनाते वक्त सीधे महसूस करता है। छह महीने बाद, वही अस्थिरता उल्टी दिशा में पलट गई: देश की सबसे बड़ी प्याज़ पट्टी नासिक के किसानों ने बाज़ार भाव को गिरकर ₹4-6 प्रति किलो होते देखा — यानी लागत से भी कम — जबकि वे ₹32/किलो मांग रहे थे और सरकार ने ₹15 का प्रस्ताव रखा। दोनों असल में एक ही विफलता है, बस खाद्य श्रृंखला के दो अलग छोर से देखी गई: न कोल्ड स्टोरेज, न कीमत का पूर्वानुमान, न मानसून या चक्रवात को झेलने लायक प्रोसेसिंग क्षमता।
सरकारी जवाब — सब्सिडी वाली सब्ज़ी वैन, बढ़ी हुई खरीद कीमत — हर बार सिर्फ भड़के हुए लक्षण को शांत करते हैं। न अगली बार का उछाल रुका है, न अगली बार की गिरावट। यह वेबसाइट यह दिखावा नहीं करेगी कि मूल समस्या हल हो गई है, क्योंकि वह नहीं हुई है।
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