रायआलोचनात्मक राय
राज्यों ने अपने टैक्स अधिकार एक वादे पर छोड़े — उस वादे के 47,272 करोड़ रुपये कभी पहुंचे ही नहीं
प्रकाशित: 23 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: CAG को पता चला: GST क्षतिपूर्ति सेस के ₹47,272 करोड़ कानून के मुताबिक राज्यों के लिए तय फंड में नहीं गए
1 जुलाई 2017 को भारत के हर राज्य ने वह चीज़ छोड़ी जो कोई भी सरकार आसानी से नहीं छोड़ती — अपनी स्वतंत्र कर लगाने की शक्ति। बदले में उन्हें एक स्पष्ट, लिखित गारंटी दी गई — अगर किसी राज्य की GST आमदनी सालाना 14% से कम बढ़ी, तो केंद्र वह अंतर पूरा करेगा, जिसके लिए गाड़ियों, तंबाकू और अन्य विलासिता व नुकसानदेह वस्तुओं पर एक विशेष सेस लगाया जाएगा, जिसे एक ऐसे फंड में जमा किया जाएगा जिसके खर्च की मंज़ूरी संसद पहले ही दे चुकी थी। अब एक CAG ऑडिट में पता चला है कि उस सेस के 47,272 करोड़ रुपये — 2017-18 में 6,466 करोड़ रुपये और 2018-19 में 40,806 करोड़ रुपये — कभी उस फंड तक पहुंचे ही नहीं। इसकी बजाय यह रकम केंद्र के सामान्य खाते में पड़ी रही, जहां से इसे किसी और मकसद के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता था। वित्त मंत्रालय इसे सुलह-प्रक्रिया में फंसी अस्थायी देरी बताता है। CAG का जवाब सीधा और स्पष्ट है: अब इसे ट्रांसफर करने के लिए संसद से दोबारा मंज़ूरी लेनी होगी — और यह किसी सामान्य देरी का लक्षण नहीं है। किसी राज्य सरकार के लिए यह कोई अमूर्त हिसाब-किताब का विवाद नहीं — यह वह पैसा है जो एक ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र, किसी शिक्षक की तनख्वाह, किसी पुल की मरम्मत के लिए इस्तेमाल होता, ठीक वही चीज़ें जिनके लिए राज्य पहले खुद टैक्स लगा सकता था और 2017 से नहीं लगा सकता। जब केंद्र एक कानूनी रूप से गारंटीशुदा भरपाई कम भेजता है, तो इंतज़ार उसी राज्य के आम नागरिक को करना पड़ता है — उन्हीं सेवाओं के लिए जिनके लिए यह पैसा तय था। GST खुद संघीय सहयोग की एक असली मिसाल थी — इतने विशाल और विविध देश में हर राज्य का एक कर-व्यवस्था पर राज़ी होना छोटी बात नहीं। यही वजह है कि उसी गारंटी तंत्र के भीतर की यह कमी उतनी ही साफगोई से सामने रखी जानी चाहिए, जितनी साफगोई से उपलब्धि को गिनाया जाता है।
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