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मेडल से पहले मैदान: खेलो इंडिया की असली कहानी बुनियादी ढांचे की है

प्रकाशित: 30 सित॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: खेलो इंडिया: फंडिंग आठ गुना बढ़ी, लेकिन जमीनी बुनियादी ढांचा अभी भी मंजूरी और पूर्णता के बीच फंसा

किसी गांव के बच्चे के लिए 'खेल में करियर' शब्द का मतलब लंबे समय तक एक ही चीज़ था — शहर जाना, वहां किसी अकादमी में दाखिला पाने के लिए संपर्क और पैसे जुटाना, या फिर वह ख्याल छोड़ देना। जिस देश ने ओलंपिक में हॉकी में लगातार दशकों तक दुनिया को हराया, वहीं ज़्यादातर जिलों में एक बच्चा अपने घर से पचास किलोमीटर के दायरे में कोई प्रशिक्षित कोच, कोई मैट, कोई ट्रैक नहीं ढूंढ पाता था। खेल एक शौक बना रह गया, ढांचा नहीं — क्योंकि राज्य ने कभी यह तय नहीं किया कि हर जिले में खेल का एक दरवाज़ा होना चाहिए। खेलो इंडिया की सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे ज़रूरी बात यही है: यह मेडल की कहानी नहीं है, दरवाज़े की कहानी है। ₹97.52 करोड़ के एक छोटे बजट से शुरू हुई योजना आज — अपने सबसे नए, जुलाई 2026 में मंज़ूर हुए रूप में — ₹36,441 करोड़ के पांच-साला परिव्यय तक पहुंच गई है। 679 जिलों में 1,000 केंद्र अधिसूचित हो चुके हैं, हर जिले में कम से कम एक। इसका मतलब यह नहीं कि हर बच्चे तक पहुंच बन गई है — यह अंक अभी लक्ष्य और वास्तविकता के बीच की दूरी भी है, जैसा जम्मू-कश्मीर के अपने आंकड़े दिखाते हैं, जहां सौ में से आठ केंद्र अभी चालू नहीं हैं। लेकिन दिशा साफ है: सुविधा अब किसी खास शहर या परिवार की किस्मत पर निर्भर नहीं करने की कोशिश हो रही है, ज़िले के नक़्शे पर एक तय जगह बनने की कोशिश हो रही है। इस कहानी का दूसरा हिस्सा ईमानदारी से कहना ज़रूरी है, क्योंकि यही इस साइट का मक़सद है। संसद की एक स्थायी समिति ने पाया कि योजना के शुरुआती वर्षों में जो पैसा आवंटित हुआ, वह पूरा खर्च ही नहीं हुआ — 2018-19 में आवंटित ₹520 करोड़ में से सिर्फ ₹324 करोड़, 2019-20 में आवंटित ₹500 करोड़ में से सिर्फ ₹318 करोड़। बिहार, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्य, जिनकी बुनियादी ढांचे की ज़रूरत सबसे ज़्यादा पहचानी गई थी, अनुदान की सूची में सिरे से गायब रहे। यह किसी योजना की असफलता की घोषणा नहीं है — यह याद दिलाना है कि पैसा आवंटित करना और पैसा ज़मीन पर उतारना दो अलग काम हैं, और दूसरा काम पहले से हमेशा कठिन होता है। यहीं पर सूक्ष्म और व्यापक, दोनों नज़रिए मिलते हैं। सूक्ष्म स्तर पर, यह उस बच्चे की कहानी है जिसे अब अपने ज़िले में ही कोच, केंद्र और प्रतियोगिता का रास्ता मिल सकता है — भले अभी यह रास्ता हर जगह पूरी तरह पक्का न बना हो। व्यापक स्तर पर, यह इस बात की कहानी है कि भारत खेल-प्रतिभा को अब किसी संयोग या पारिवारिक साधन-संपन्नता पर नहीं, बल्कि एक जानबूझकर बनाई गई पहचान-प्रणाली पर आधारित करना चाहता है — 2018 की पहली स्कूल गेम्स के 3,507 खिलाड़ियों से 2025 की यूथ गेम्स के दस हज़ार से अधिक खिलाड़ियों तक का सफ़र इसी इरादे का प्रमाण है, मेडल तालिका का नहीं। मेडल जो भी आएं, वे किसी खिलाड़ी की मेहनत का फल हैं। यह योजना सिर्फ इतना सुनिश्चित करने की कोशिश है कि वह मेहनत करने का मौका किसी बच्चे को उसके पिन कोड की वजह से न मिले, न छूटे।
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