मोदी ने किया क्या है?
रायमिश्रित राय

ऑनलाइन गेमिंग प्रतिबंध का निशाना संचालक हैं, खिलाड़ी नहीं। खुला सवाल यह है कि खिलाड़ी कहाँ जाएँगे

प्रकाशित: 18 अक्टू॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: संसद ने रियल-मनी ऑनलाइन गेम पर रोक लगाई — संचालकों को 3 साल तक क़ैद और ₹1 करोड़ तक जुर्माना, ई-स्पोर्ट्स को समर्थन; निशाना खिलाड़ी नहीं

संसद ने रियल-मनी गेम पर दो दिन में फ़ैसला किया, और घोषित कारण समझना आसान है: लत, डूबती बचत और धोखाधड़ी, ख़ासकर युवाओं में। क़ानून दाँव वाले कौशल के खेल और दाँव वाले संयोग के खेल को एक जैसा मानता है, जिससे इस पुरानी बहस का अंत होता है कि जुआ कहाँ ख़त्म होता है और कौशल कहाँ शुरू। यह एक साफ़ रास्ता भी खुला छोड़ता है: ई-स्पोर्ट्स और बिना दाँव वाले खेल, जिनमें मान्य टूर्नामेंट के लिए प्रवेश शुल्क और इनाम की अनुमति है। पर प्रतिबंध इलाज नहीं है। हमने जो सार पढ़े वे कहते हैं कि दंड उन पर पड़ता है जो खेल देते हैं, विज्ञापन करते हैं या भुगतान संसाधित करते हैं, और एक लॉ फ़र्म कहती है कि खिलाड़ी को दंड नहीं है। यह समझदारी है, पर इसका मतलब यह भी है कि जो खेलना चाहे, वह तब भी खेल सकता है अगर कोई ऐप देश के बाहर से पहुँच में हो। क़ानून से पहले कितने लोगों को नुक़सान हुआ, कितनों ने खेलना छोड़ा, या वे बिना लाइसेंस की साइटों पर गए या नहीं, इसके आंकड़े हमें नहीं मिले। इनके बिना अभी कोई नहीं कह सकता कि क़ानून उपयोगकर्ताओं को बचाता है या समस्या को सिर्फ़ खिसकाता है। गिनने लायक़ क़ीमत भी है। एक लॉ फ़र्म द्वारा उद्धृत उद्योग-पूर्वानुमान ने 2029 तक क्षेत्र को ₹78,551 करोड़ का बताया, और कहा कि रियल-मनी गेमिंग में 2 लाख से अधिक लोग काम करते हैं। ये प्रतिबंध से पहले के अनुमान हैं, पर दिखाते हैं कि असली रोज़गार और कर दाँव पर थे। बिना वारंट तलाशी और गिरफ़्तारी की शक्तियों पर भी बहस होनी चाहिए, क्योंकि वे ईमेल और सोशल-मीडिया खातों तक पहुँचती हैं। निष्पक्ष निष्कर्ष: साफ़ निशाना, ई-स्पोर्ट्स के लिए उचित रास्ता, और ज़रूरी आंकड़े अभी ग़ायब।
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