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पेपर-लीक पर सख़्त क़ानून: सज़ा आधा जवाब है, और छात्र बाक़ी आधे का इंतज़ार कर रहे हैं

प्रकाशित: 18 अक्टू॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: NEET 2026 रद्द होने के बाद संसद ने पेपर-लीक की सज़ाएँ बढ़ाईं और 2 महीने व 3 महीने की समय-सीमाएँ तय कीं — आलोचक पूछते हैं कि क्या सिर्फ़ सज़ा से परीक्षा व्यवस्था ठीक होगी

मई 2026 में कथित पेपर लीक के बाद जब NEET रद्द हुई, तब सालों से तैयारी कर रहे लाखों छात्रों को दोबारा करने को कहा गया। संसद ने लगभग दस हफ़्तों में जवाब दिया। संशोधित क़ानून परीक्षा सेवा प्रदाताओं पर जुर्माना ₹5 करोड़ तक बढ़ाता है, संगठित परीक्षा अपराध पर न्यूनतम सात साल क़ैद रखता है, दोषी प्रदाताओं पर रोक दोगुनी करके आठ साल करता है, और दो महीने में जाँच व चार्जशीट से तीन महीने में सुनवाई का वादा करता है। यह एक गंभीर विफलता का गंभीर जवाब है, और कई दलों के सदस्यों ने इसका समर्थन किया। पर यह पूछना ज़रूरी है कि क़ानून क्या छूता है और क्या नहीं। यह लीक के बाद की बातों के इर्द-गिर्द बना है: गिरफ़्तारी, आरोप, सुनवाई, सज़ा। हमने जो स्रोत पढ़े वे यह नहीं बताते कि प्रश्न-पत्र कैसे लिखा, छापा, रखा और पहुँचाया जाता है, या परीक्षा कैसे चलाई जाती है, जहाँ से लीक शुरू होता है। बहस में विपक्षी सदस्यों ने ठीक यही कहा: केवल कड़ी सज़ा और फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें पारदर्शिता नहीं लाएँगी। कुछ ने चिकित्सा प्रवेश कराने के तरीक़े में गहरे बदलाव चाहे। फिर रफ़्तार का वादा है। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार सुनवाई की तय समय-सीमा 2002 के उस सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले से असहज बैठती है जिसने कहा था कि अदालतों को बाहरी सीमाओं में नहीं बाँधना चाहिए। क़ानून पुलिस के दो महीने की जाँच-सीमा चूकने पर कोई परिणाम नहीं देता। और दूसरे अपराधों के लिए पहले से मौजूद फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों में 2025 के अंत में 2,45,579 मामले लंबित थे, जबकि एक साल पहले 2,04,122। परीक्षा के मामले तेज़ चलेंगे या नहीं, यह अभी उम्मीद है, रिकॉर्ड नहीं। छात्र तीन चीज़ें चाहेंगे जो स्रोत अभी नहीं देते: पिछले कितने लीक में सज़ा हुई, पर्चों की हिफ़ाज़त में क्या बदला है, और अगली परीक्षा कब ऐसी होगी जिस पर भरोसा हो सके। जब तक ये जवाब नहीं आते, क़ानून काग़ज़ पर ज़्यादा मज़बूत रोकथाम है। असली परीक्षा अगला परीक्षा-मौसम है।
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