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NEET 2026 रद्द होने के बाद संसद ने पेपर-लीक की सज़ाएँ बढ़ाईं और 2 महीने व 3 महीने की समय-सीमाएँ तय कीं — आलोचक पूछते हैं कि क्या सिर्फ़ सज़ा से परीक्षा व्यवस्था ठीक होगी

प्रकाशित: 18 अक्टू॰ 2026

मई 2026जुल॰ 2026

पहले बनाम अभी

दोषी सेवा प्रदाता पर रोक (वर्ष)

2024 का अधिनियम

4

2026 का संशोधन

8

सेवा प्रदाता पर अधिकतम जुर्माना (₹ करोड़)

2024 का अधिनियम

1

2026 का संशोधन

5

संगठित परीक्षा अपराध में न्यूनतम क़ैद (वर्ष)

2024 का अधिनियम

5

2026 का संशोधन

7

बलात्कार और POCSO के फ़ास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों में लंबित मामले (एक तुलना-मानक, परीक्षा मामले नहीं)

2023 के अंत में
2,02,175
2025 के अंत में
2,45,579
2024 के अंत में
2,04,122

क़ानून अब पेपर लीक को कहीं सख़्त सज़ा देता है और तेज़ सुनवाई का वादा करता है। अभी यह पता नहीं कि अदालतें ये समय-सीमाएँ पूरी कर पाएँगी या नहीं, और नए नियम इस पर कम बोलते हैं कि परीक्षा के पर्चे पहली जगह सुरक्षित कैसे रखे जाएँ।

NEET 2026 में क्या हुआ

NEET (UG) स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने इसे 3 मई 2026 को कराया और 12 मई 2026 के निर्णय में रद्द कर दिया। PRS उसी दिन की एक PIB विज्ञप्ति का हवाला देता है, जिसका शीर्षक है 'CBI Registers Case in alleged Paper Leak in NEET-UG 2026'। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च दर्ज करता है कि परीक्षा अगले महीने दोबारा कराई गई। दोबारा परीक्षा में उपस्थिति, प्रभावित परीक्षार्थियों की संख्या और कोई गिरफ़्तारी या सज़ा पढ़े गए स्रोतों में नहीं मिली।

पहले और बाद का क़ानून

लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम, 2024 UPSC, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड, बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी, केंद्रीय मंत्रालयों और अन्य अधिसूचित निकायों की परीक्षाओं पर लागू होता है। 2026 का संशोधन अनुचित साधन इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की सज़ा 3 से 5 साल क़ैद और ₹10 लाख तक जुर्माने से बढ़ाकर 5 से 10 साल और ₹50 लाख तक करता है। सेवा प्रदाता के लिए जुर्माना ₹1 करोड़ तक से बढ़कर ₹5 करोड़ तक हो जाता है। सेवा प्रदाता के प्रभारी व्यक्तियों के लिए न्यूनतम क़ैद 3 से बढ़कर 5 साल और जुर्माना ₹5 करोड़ होता है। संगठित अपराध के लिए न्यूनतम सज़ा 5 से बढ़कर 7 साल और न्यूनतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़कर ₹10 करोड़ हो जाता है। दोषी पाए गए सेवा प्रदाता पर रोक 4 की जगह 8 साल की होती है।

मामले कैसे चलने हैं

संशोधन केंद्र को जाँच के लिए विशेष कार्यबल बनाने देता है, जाँच दो महीने में पूरी करना ज़रूरी करता है, और हर राज्य व केंद्र शासित प्रदेश को एक सत्र न्यायालय को विशेष फ़ास्ट-ट्रैक अदालत के रूप में नामित करने को कहता है। सुनवाई रोज़ाना चलनी है और चार्जशीट के तीन महीने के भीतर पूरी होनी है, और अधिनियम के तहत लंबित मामले इन अदालतों में जाते हैं, स्थानांतरण से तीन महीने के भीतर निपटान के साथ। अपील उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ में जाती है, 30 दिन में (90 दिन से देर नहीं) दाख़िल होनी है और जहाँ तक संभव हो तीन महीने में निपटनी है।

संसद में स्थिति

विधेयक 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश हुआ, 29 जुलाई को लोकसभा और 30 जुलाई को राज्यसभा से पारित हुआ। PRS का ट्रैकर अधिनियम का पाठ सूचीबद्ध करता है, पर राष्ट्रपति की स्वीकृति और अधिसूचना की तारीख़ पढ़े गए पन्नों में नहीं बताई गई। PRS द्वारा उद्धृत सरकार का घोषित उद्देश्य निष्पक्षता मज़बूत करना, सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता बढ़ाना और समयबद्ध जाँच व शीघ्र सुनवाई संभव बनाना है।

उठाई गई चिंताएँ

PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च कई मुद्दे गिनाता है। 2002 के एक सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले ने कहा था कि आपराधिक कार्यवाही की बाहरी समय-सीमा तय करना न उचित है, न न्यायिक रूप से अनुमत, इसलिए तीन महीने की सुनवाई-सीमा को चुनौती मिल सकती है। अपील के लिए 90 दिन की सीमा अनिवार्य है या नहीं, इस पर उच्च न्यायालयों में मतभेद है: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इसे विवेकाधीन पढ़ा, मद्रास उच्च न्यायालय ने नहीं। जाँच की दो महीने की सीमा चूकने पर विधेयक कोई परिणाम नहीं देता, जबकि कुछ अन्य क़ानून कारण लिखित दर्ज करना ज़रूरी करते हैं। PRS बलात्कार और POCSO मामलों की ऐसी ही फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों का रिकॉर्ड भी बताता है: 2025 के अंत में 2,45,579 मामले लंबित थे, जबकि 2024 के अंत में 2,04,122, और POCSO फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों में औसत सुनवाई समय राज्यों में 257 दिन से 1,717 दिन तक रहा। संसद में विपक्षी सदस्यों ने विधेयक का समर्थन किया पर बदलावों को अपर्याप्त कहा और बोले कि केवल कड़ी सज़ा और फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें पारदर्शिता नहीं लाएँगी; कुछ ने चिकित्सा प्रवेश कराने के तरीक़े में बदलाव की माँग की। कई दलों के सदस्यों ने विधेयक का समर्थन किया।

सूक्ष्म दृष्टि: परीक्षार्थी के लिए इसका क्या अर्थ है

परीक्षार्थी के लिए रद्द परीक्षा का अर्थ है नई तारीख़ पर दोबारा तैयारी और परीक्षा, उसके ख़र्च और तनाव के साथ। सख़्त क़ानून का निशाना आयोजक, लीक नेटवर्क और सेवा प्रदाता हैं, पर यह अनुचित साधन इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की सज़ा भी 5 से 10 साल क़ैद तक बढ़ाता है। यह परीक्षार्थी को नहीं बताता कि कोई परीक्षा लीक-रहित होगी या नहीं, और पिछले कितने लीक में सज़ा हुई, इसका कोई आंकड़ा नहीं मिला।

व्यापक दृष्टि: सज़ा बनाम रोकथाम

संशोधन मुख्यतः सज़ा, समय-सीमा और अदालतों पर काम करता है। पढ़े गए स्रोत यह नहीं बताते कि पर्चे कैसे बनें, छपें, रखे और पहुँचाए जाएँ, या परीक्षाएँ कैसे कराई जाएँ, इसमें कोई बदलाव है, और इस प्रविष्टि ने परीक्षा एजेंसी के अपने सुधार नहीं पढ़े। कड़ा क़ानून लीक रोकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि मामले कितनी बार सज़ा तक पहुँचते हैं, जो पढ़े गए स्रोत 2024 के अधिनियम के लिए नहीं बताते। यह भी खुला प्रश्न है कि जिन फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों में दूसरे क्षेत्रों में पहले से बड़ा बैकलॉग है, वे तीन महीने की सीमा पूरी कर पाएँगी या नहीं।

जो शामिल नहीं है

अधिनियम और विधेयक का अपना पाठ, NTA का रद्द करने का निर्णय और CBI की विज्ञप्ति (PRS द्वारा उद्धृत पर खोली नहीं गईं), NEET की दोबारा परीक्षा की उपस्थिति और परिणाम, हाल के वर्षों में लीक से प्रभावित परीक्षाओं और परीक्षार्थियों की संख्या, 2024 के अधिनियम के तहत सज़ाएँ, राष्ट्रपति की स्वीकृति, और पर्चा सुरक्षा में परीक्षा एजेंसी के कोई बदलाव नहीं पढ़े गए। एक समाचार सार PRS की तालिका से अलग अधिकतम जुर्माना (दस करोड़ रुपये तक) बताता है; यह प्रविष्टि विधेयक की PRS तालिका का अनुसरण करती है।

परीक्षा की निष्पक्षताNEETपेपर लीक क़ानून

स्रोत

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आख़िरी बार सत्यापित: 18 अक्टू॰ 2026

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