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बिजली मीटर को उलटा घूमने में सात दशक लगे

प्रकाशित: 30 सित॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: पीएम सूर्य घर योजना: 50 लाख से अधिक घरों तक पहुंची छत पर सौर बिजली — 1 करोड़ के लक्ष्य के सामने असली तस्वीर

आज़ाद भारत की पहली पहचान में बिजली एक दुर्लभ चीज़ थी। गांव में बिजली का खंभा पहुंचना किसी उत्सव जैसा होता था, और शहर में भी बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर मीटर के नए कनेक्शन के लिए लगी लंबी कतार आम बात थी — कई बार महीनों, कभी बरसों का इंतज़ार। बिजली का बिल आता था, चुकाना पड़ता था, और उसे कम करने का एक ही रास्ता था: कम इस्तेमाल करना। यह विचार ही असंभव लगता कि एक दिन घर की छत खुद बिजली बनाएगी, उस बिजली को बेचकर पैसा भी घर में आएगा, और मीटर उलटा भी घूम सकता है। पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के आंकड़े इस बदलाव को ठोस शक्ल देते हैं। अगस्त 2026 तक 50 लाख से ज़्यादा घरों की छत पर सौर पैनल लग चुके हैं, उनमें से 19 लाख घरों का बिजली बिल शून्य हो गया है, और 12 लाख से अधिक घरों ने मिलकर नेट-मीटरिंग के ज़रिए अतिरिक्त बिजली बेचकर वित्त वर्ष 2024-25 में ₹421 करोड़ कमाए। यह किसी योजना के ब्रोशर की बात नहीं है — यह असली पैसा है जो असली घरों के खातों में पहुंचा है। जिस देश ने बिजली कनेक्शन के लिए दशकों इंतज़ार करना सीखा था, वहां अब एक घर बिजली विभाग से कुछ मांगने के बजाय उसे कुछ देने की स्थिति में है। यह फ़र्क छोटा नहीं है। लेकिन यही ईमानदारी इस कहानी का दूसरा हिस्सा भी मांगती है। योजना का लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक 1 करोड़ घरों तक पहुंचना है, और अगस्त 2026 तक यह आधे रास्ते पर ही है — करीब 50 लाख घर, यानी लक्ष्य का लगभग आधा, बाकी सात महीनों में। रफ्तार तेज़ हुई है, रोज़ाना की स्थापनाएं कई गुना बढ़ी हैं, फिर भी अंतर बड़ा है। कुछ राज्यों में सब्सिडी का पैसा 30 दिन के तय समय में आ जाता है, तो कुछ राज्यों में तीन-चार महीने लग जाते हैं। कुछ राज्य — गुजरात, महाराष्ट्र — बहुत आगे हैं, तो पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में अभी शुरुआत ही हुई है। स्थानीय वेंडरों की गुणवत्ता में भी फ़र्क है, और डिस्कॉम की गलत बिलिंग की शिकायतें भी सामने आई हैं। यह सब सच है, और इसे छिपाने से योजना की असली उपलब्धि कम नहीं होती — बल्कि उसे और भरोसेमंद बनाती है। इस योजना में एक और परत है जो सिर्फ घर की बिजली से आगे जाती है। हर सब्सिडी वाला पैनल सरकार की अनुमोदित सूची से ही आना है, और आयातित पैनलों पर सीमा शुल्क लगता है — यानी यह मांग भारत के अपने, अभी बढ़ते सौर-निर्माण उद्योग की ओर मुड़ रही है, किसी और देश के कारखानों की ओर नहीं। जो देश एक समय बिजली के हर उपकरण के लिए बाहर देखता था, वह अब अपनी छत की बिजली अपने ही देश में बने पैनल से बना रहा है। यह गर्व की बात है, पर यह भी सच है कि अभी यह एक शुरुआत है, पूरी कहानी नहीं। तो असली तस्वीर यही है: 50 लाख घरों की छत पर सूरज अब बिजली बना रहा है, बिल घटा है, कुछ घरों की जेब में पैसा भी आया है, और यह एक ऐसे देश में हो रहा है जिसने बिजली कनेक्शन के लिए कतार में खड़े होना अपनी पीढ़ियों की आदत बना लिया था। और यह भी असली है कि 1 करोड़ का लक्ष्य अभी दूर है, देरी और असमानता अभी बाकी है। दोनों बातें एक साथ सच हैं — और दोनों को साथ रखना ही इस बदलाव को समझने का सही तरीका है।
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