रायमिश्रित राय
भारत की रेयर अर्थ मैग्नेट कहानी: कच्चा माल अक्सर यहीं है, तैयार मैग्नेट अभी नहीं
प्रकाशित: 30 सित॰ 2026
इस पर एक संपादकीय राय: भारत ने ₹34,300 करोड़ की क्रिटिकल मिनरल मिशन और रेयर अर्थ मैग्नेट योजना शुरू की — फिर भी लगभग 93% मैग्नेट अब भी चीन से आयात हो रहे हैं
किसी ज़माने में यह देश कपास उगाता था, उसे जहाज़ों में बाहर भेजता था, और फिर उसी कपास से बने कपड़े को कई गुना दाम पर वापस ख़रीदता था — कच्चा माल यहीं था, मूल्य-वर्धन कहीं और होता था। आज़ाद भारत ने दशकों की मेहनत से इस ढांचे को पीछे छोड़ने की कोशिश की है। इसलिए यह जानना बेचैन कर देने वाला है कि ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु — वही चार राज्य जिन्हें 2026-27 के बजट में 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' के लिए चुना गया — दुनिया के सबसे बड़े मोनाज़ाइट (एक रेयर अर्थ अयस्क) भंडारों में से कुछ रखते हैं, और फिर भी भारत ने अपने ज़्यादातर तैयार रेयर अर्थ मैग्नेट — लगभग 93% — चीन से मंगवाए। कच्चा माल अक्सर यहीं है। उससे बनने वाला ऊंची कीमत का तैयार पुर्ज़ा अभी यहां नहीं बनता।
एक सामान्य भारतीय परिवार के लिए इसका मतलब कहीं दूर की बात नहीं है। घर के पंखे में, एसी के कंप्रेसर में, स्कूटर या कार की मोटर में — इन सबके भीतर यही मैग्नेट काम करता है। बीजिंग में लिया गया कोई लाइसेंसिंग फ़ैसला, जिस पर किसी भारतीय कंपनी की कोई राय नहीं होती, यह तय कर सकता है कि ये चीज़ें कब और किस दाम पर बाज़ार में आएं। यह किसी बड़ी नीति की बहस से पहले, एक घर के बजट की बात है।
बड़े स्तर पर यही मैग्नेट मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और रेडार में भी लगते हैं, और भारत का उपयोगी रक्षा-भंडार महज़ दो से तीन हफ्ते का बताया जाता है। यही वजह है कि इसे एक व्यापार आंकड़े से कहीं ज़्यादा गंभीरता से लिया जाना चाहिए — यह तय करता है कि भारत अपनी रक्षा-तैयारियों की समय-सीमा खुद तय करता है, या वह किसी दूसरे देश के दफ़्तर के फैसले पर टिकी रहती है।
यहां ईमानदार रहना ज़रूरी है, क्योंकि यह कहानी अभी लिखी जा रही है। जनवरी 2025 का ₹34,300 करोड़ का मिशन, नवंबर 2025 की ₹7,280 करोड़ की मैग्नेट योजना, और फरवरी 2026 के बजट के कॉरिडोर — यह सब वास्तविक पैसा, वास्तविक लक्ष्य और सरकार की तरफ़ से गंभीर रुख दिखाते हैं। पर एक लक्ष्य, एक मैग्नेट नहीं होता। सितंबर 2026 तक टेंडर की तकनीकी बोलियां ही खुली थीं, वित्तीय बोलियां और अनुबंध अभी बाकी थे, और 6,000 मेट्रिक टन प्रति वर्ष के लक्ष्य में से एक टन भी असल में नहीं बना था। सफलता की पहचान मंत्रिमंडल का नोट नहीं होगी — वह दिन होगा जब किसी भारतीय घर के पंखे या किसी भारतीय मिसाइल को अपने काम के लिए किसी और देश की इजाज़त की ज़रूरत नहीं रहेगी।
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