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असली बात आधार नहीं — यह है कि एक संस्था ने ना कहने का साहस दिखाया

प्रकाशित: 23 सित॰ 2026

इस पर एक संपादकीय राय: सुप्रीम कोर्ट ने आधार की मूल संवैधानिकता बरकरार रखी, बैंक-मोबाइल से अनिवार्य लिंकिंग रद्द की

आज़ादी के शुरुआती दशकों में भारत अभी अपने राज्य की बुनियादी नींव रख ही रहा था — एक ऐसी विशिष्ट पहचान प्रणाली जो उस अपमान को खत्म करे जब कोई गरीब परिवार महज नाम की गलत स्पेलिंग की वजह से राशन से वंचित रह जाए, या अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए तीन अलग-अलग दफ्तरों की कतार में तीन बार खड़ा हो। यह वादा असली था, और 2018 के फैसले ने इसे बरकरार रखा — कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार संवैधानिक बना रहा। लेकिन इसी फैसले ने एक और काम किया, जिसे अलग से गिनाया जाना चाहिए — इसने राज्य की अपनी ज़्यादती के खिलाफ एक साफ रेखा खींची। आधार अधिनियम की धारा 57, जो किसी बैंक, मोबाइल कंपनी या स्कूल को 12 अंकों के नंबर को अस्तित्व की शर्त बनाने की छूट देती थी, उसे असंवैधानिक करार दिया गया। इसका मतलब है — अब किसी माता-पिता को बच्चे का स्कूल में दाखिला कराने के लिए आधार दिखाना ज़रूरी नहीं, नया सिम कार्ड लेने से आधार न होने पर मना नहीं किया जा सकता, और बैंक खाता खोलने के लिए यह अकेली शर्त नहीं बन सकती। एक आम नागरिक के लिए यही फर्क है — एक ऐसा औज़ार जो आपकी सेवा करे, और एक ऐसा औज़ार जो आपको बाहर करने के लिए इस्तेमाल हो सके। 4:1 के बहुमत ने, और एक असहमत न्यायाधीश ने तो और आगे जाकर, ज़्यादा सुरक्षात्मक रास्ता चुना। आज़ादी के बाद खरोंच से बनाई गई एक अदालत का इतने दशकों बाद भी उसी राज्य को रोक पाना — यही असल उपलब्धि है। समर्पित डेटा सुरक्षा कानून आने में पांच और साल लगे — यह सच्चाई असली है, और इसे भी रिकॉर्ड में रहना चाहिए। पहले अदालत ने अपना काम किया।
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