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दिवाला संहिता (IBC) के दस साल: वसूली पुरानी व्यवस्था से बेहतर, पर लेनदार अब भी लगभग दो-तिहाई छोड़ते हैं और प्रक्रिया लंबी है

प्रकाशित: 1 अक्टू॰ 2026

मई 2016अग॰ 2026

पहले बनाम अभी

लेनदारों की वसूली (समाधान योजनाओं में, सितंबर 2025 तक)

मंज़ूर दावे

₹12.31 लाख करोड़

वसूली

₹3.99 लाख करोड़ (≈32-33%)

मामलों के नतीजे (मार्च 2026)

समाधान योजना
1,419
परिसमापन
3,003
कुल दाखिल मामले
8,987

समाधान में औसत दिन बनाम कानूनी सीमा

कानूनी सीमा

330 दिन

औसत (सितंबर 2025 तक)

603 दिन

IBC ने डूबे कर्ज़ की वसूली का एक कानूनी रास्ता दिया जो पहले से बेहतर बताया जाता है, पर औसत मामले में लेनदार दो-तिहाई छोड़ते हैं और निपटारे में समय सीमा से कहीं अधिक लगता है।

संहिता ने क्या बदला

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) 2016 में लागू हुई, ताकि चूक करने वाली कंपनी का समाधान एक समयबद्ध प्रक्रिया से हो और नियंत्रण कर्ज़दाता को लौटे। मई 2026 में, संहिता के दस साल पर, IBBI अध्यक्ष ने बताया कि संहिता के तहत औसत वसूली करीब 30% रही है, जबकि पहले की व्यवस्थाओं में 15-20% बताई जाती थी, और 2024-25 में वसूली 36.6% थी (पिछले साल 28.3%)। उन्होंने यह भी कहा कि समाधान की अवधि पहले के 6-8 साल से घटकर लगभग 2 साल रह गई। बैंकिंग क्षेत्र का NPA अनुपात 2017 के 11.8% से सितंबर 2025 तक 2.1% हुआ; यह गिरावट कई कारणों से हुई है और केवल IBC को श्रेय देना संभव नहीं, इसलिए यह प्रविष्टि उसे IBC का प्रभाव नहीं मानती।

आँकड़े: कितने मामले, कितनी वसूली

IBBI की सितंबर 2025 तक की न्यूज़लेटर के अनुसार लेनदारों ने मंज़ूर समाधान योजनाओं में ₹12.31 लाख करोड़ के दावों के मुकाबले ₹3.99 लाख करोड़ वसूले, यानी लगभग 32-33%; यानी करीब 67% की ‘हेयरकट’ (बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार)। IBBI ने ख़ुद कहा कि इस वसूली में CIRP की लागत शामिल नहीं और कई संभावित भविष्य की वसूलियाँ (इक्विटी, गारंटी, डाली गई पूँजी, परिहार-आवेदन) भी नहीं गिनी गईं, इसलिए वास्तविक वसूली इससे कुछ अधिक हो सकती है। मार्च 2026 तक 8,987 मामले दाखिल हुए, 7,102 बंद हुए, जिनमें 1,419 में समाधान योजना आई और 3,003 परिसमापन में गए (IBBI अध्यक्ष के हवाले से)। समाधान योजना तक पहुँचे लगभग 40% मामले (1,268 में से 516) पहले BIFR में थे या निष्क्रिय थे, और उनमें दावेदारों को केवल 18.74% मिला।

देरी: कानूनी सीमा बनाम असल अवधि

IBBI के आँकड़ों के अनुसार (बिज़नेस स्टैंडर्ड), समाधान योजना तक पहुँचने वाले मामलों में औसतन 603 दिन लगे (प्राधिकरण द्वारा बाहर रखे गए समय को छोड़कर), और परिसमापन के आदेश तक पहुँचे 2,896 मामलों में औसतन 518 दिन। यह संहिता की मूल सीमा से काफ़ी अधिक है (संशोधन के बाद मुकदमेबाज़ी सहित 330 दिन)। IBBI अध्यक्ष का ‘लगभग 2 साल’ का दावा और ये औसत एक ही दिशा के हैं, पर अलग-अलग गणनाओं पर आधारित हैं।

आम कर्ज़दाता और देश के लिए मतलब

एक आम जमाकर्ता के लिए IBC का मतलब यह है कि बैंक के फँसे कर्ज़ की वसूली का एक संगठित रास्ता है; पर चूँकि बैंक औसतन दावे का लगभग एक-तिहाई ही पाता है, बाकी नुकसान बैंक की बैलेंस शीट पर आता है। मोटे तौर पर ₹4 लाख करोड़ की कुल वसूली करीब 1.46 अरब आबादी पर लगभग ₹2,700 प्रति व्यक्ति बैठती है (साइट की अपनी गणना; यह केवल पैमाने का अनुमान है)। देश के स्तर पर, IBC ने ऋण-अनुशासन का एक औपचारिक ढाँचा दिया, जिसे IBBI अध्यक्ष के अनुसार समाधान के बाद कंपनियों की औसत बिक्री 89% और पूँजीगत व्यय 106% बढ़ने जैसे आँकड़ों से जोड़ा जाता है (ये IBBI के अपने आँकड़े हैं, स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं)।

जो अब भी अधूरा है

व्यक्तिगत गारंटरों के मामले में स्थिति कमज़ोर है: बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार जून 2026 तक 64 मामलों से कर्ज़दाताओं को ₹234.56 करोड़ मिले, जो उन पर मंज़ूर कुल दावों का लगभग 1% है। परिसमापन में पहुँचने वाले मामलों की संख्या भी बड़ी (3,003) है। यह प्रविष्टि इस पर निर्णय नहीं देती कि 67% की कटौती ऐसी प्रक्रिया की स्वाभाविक कीमत है जहाँ कंपनियाँ पहले ही बहुत कमज़ोर हालत में पहुँचती हैं, या सुधार की गुंजाइश अब भी बड़ी है।

बैंकिंगIBCदिवाला

स्रोत

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आख़िरी बार सत्यापित: 1 अक्टू॰ 2026

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