कवच: बालासोर के बाद तेज़ हुई भारत की स्वदेशी रेल-सुरक्षा प्रणाली — अभी भी पूरे नेटवर्क तक नहीं पहुंची
प्रकाशित: 30 सित॰ 2026
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कवच से सुरक्षित रूट-किमी
2 जून 2023 (बालासोर हादसे के समय)
लगभग 1,465 रूट-किमी (नेटवर्क का ~2%)
31 जुलाई 2026 (दो प्राथमिकता मुख्य गलियारों पर)
2,633 रूट-किमी (दिल्ली-मुंबई + दिल्ली-हावड़ा)
भारत के ब्रॉड-गेज नेटवर्क में हिस्सेदारी
जून 2023
लगभग 2% (~68,000 रूट-किमी नेटवर्क में से)
जुलाई 2026 (केवल प्राथमिकता गलियारों के हिसाब से)
लगभग 3.7% (~70,400 रूट-किमी नेटवर्क में से)
मासिक रोलआउट रफ़्तार
दिसंबर 2023 (हादसे के छह महीने बाद)
लगभग 10 अतिरिक्त रूट-किमी छह महीनों में
जनवरी 2026
एक महीने में 472.3 रूट-किमी — अब तक की सबसे तेज़ रफ़्तार
भारत की स्वदेशी ट्रेन-टक्कर रोकने वाली प्रणाली अब तेज़ी से फैल रही है — उस हादसे के तीन साल बाद जिसने दिखाया कि यह नेटवर्क के कितने छोटे हिस्से पर थी।
TCAS से राष्ट्रीय मानक तक
कवच की शुरुआत 2011-2012 के आसपास हुई, जब रिसर्च डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन (RDSO) ने तीन भारतीय कंपनियों — मेधा सर्वो ड्राइव्स, कर्नेक्स माइक्रोसिस्टम्स और एचबीएल पावर सिस्टम्स — के साथ मिलकर एक स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली विकसित करना शुरू किया, जिसे शुरू में ट्रेन कोलिज़न अवॉइडेंस सिस्टम (TCAS) कहा गया। मक़सद था — यूरोपीय ETCS जैसी महंगी विदेशी प्रणालियों का एक सस्ता, स्वदेशी विकल्प तैयार करना। यात्री ट्रेनों पर फील्ड ट्रायल फ़रवरी 2016 में शुरू हुए; प्रणाली को पहला ऑपरेशनल प्रमाणन 2018-19 में मिला, जब तीन वेंडरों को कवच वर्शन 3.2 सप्लाई करने की मंज़ूरी दी गई। रेलवे बोर्ड ने जुलाई 2020 में औपचारिक रूप से कवच को भारत की राष्ट्रीय ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली के रूप में अपनाया। 2020 के दशक की शुरुआत में इसकी तैनाती सीमित और स्थानीय ही रही — मुख्यतः दक्षिण मध्य रेलवे के पायलट सेक्शनों तक, जो जून 2023 तक लगभग 1,465 रूट-किमी और लगभग 144 इंजनों तक पहुंची।
बालासोर: कवच क्या कर सकता था, क्या नहीं
2 जून 2023 को ओडिशा के बालासोर में बहानागा बाज़ार के पास कोरोमंडल एक्सप्रेस एक खड़ी मालगाड़ी से जा टकराई, जिसमें 296 लोगों की मौत हुई और 1,200 से अधिक घायल हुए — पिछले कई दशकों की सबसे भीषण रेल दुर्घटनाओं में से एक। जांच में तत्काल कारण एक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग/पॉइंट मशीन की गड़बड़ी पाई गई, जिसकी वजह से एक्सप्रेस मुख्य लाइन के बजाय लूप लाइन पर चली गई; सीबीआई जांच में बाद में तीन रेलवे अधिकारियों पर आरोप तय हुए। इस मार्ग पर कवच लगा ही नहीं था — तब देशभर में यह लगभग 1,465 रूट-किमी पर, यानी भारत के तत्कालीन लगभग 68,000 रूट-किमी के ब्रॉड-गेज नेटवर्क के लगभग 2% हिस्से पर मौजूद था। रेलवे बोर्ड के अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कवच, जैसा डिज़ाइन किया गया है, इस विशेष दुर्घटना को नहीं रोक सकता था, क्योंकि इसका मुख्य काम पीछे से टक्कर, सिग्नल पार करने और अधिक गति जैसी स्थितियों को रोकना है, न कि गलत रूट पर पॉइंट/इंटरलॉकिंग की खराबी को — यह दावा कुछ सुरक्षा विश्लेषकों द्वारा विवादित रहा है, हालांकि किसी स्वतंत्र जांच ने इसे औपचारिक रूप से खारिज नहीं किया। जो बात विवादित नहीं है, वह यह है कि इस मार्ग पर कवच की लगभग पूर्ण अनुपस्थिति इस दुर्घटना का सबसे प्रत्यक्ष प्रतीक बन गई, और इसके बाद इसे तेज़ी से लागू करने का दबाव बढ़ा। यह तेज़ी तुरंत नहीं आई — समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, बालासोर के छह महीने बाद देशभर में केवल लगभग 10 अतिरिक्त रूट-किमी ही जोड़े गए थे; असली रफ़्तार पकड़ने में एक-दो साल और लगे।
कवच 4.0 और रिकॉर्ड तोड़ता 2026
RDSO ने 16 जुलाई 2024 को कवच का एक नया, इंटरऑपरेबल वर्शन — कवच 4.0 — मंज़ूर किया, जो तीनों स्वीकृत वेंडरों के उपकरणों को एक ही सेक्शन पर साथ काम करने देने के लिए बनाया गया था, जो पहले के वर्शनों में पूरी तरह संभव नहीं था। दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-कोलकाता के हाई-डेंसिटी मुख्य मार्गों को कवर करने की शुरुआती समय-सीमा, मार्च 2025, वेंडर-अनुमोदन की धीमी प्रक्रिया के कारण खिसककर दिसंबर 2025 हो गई (कुछ समय तक केवल एचबीएल पावर को ही पूरी मंज़ूरी मिली थी; कर्नेक्स, मेधा सर्वो और रेलटेल पीछे रहे)। इसके बाद रफ़्तार तेज़ी से बढ़ी: भारतीय रेलवे ने जनवरी 2026 में एक ही महीने में 472.3 रूट-किमी पर कवच 4.0 चालू किया — वडोदरा-विरार (पश्चिम रेलवे), तुगलकाबाद-पलवल (उत्तर रेलवे) और मानपुर-सरमतांड़ (पूर्व मध्य रेलवे) सेक्शनों में — जिसे आधिकारिक रूप से एक दिन और एक महीने दोनों में अब तक की सबसे अधिक तैनाती बताया गया, जिसने कोटा-मथुरा सेक्शन के पिछले रिकॉर्ड 324 रूट-किमी को पीछे छोड़ दिया। इसके बाद 2026 भर अलग-अलग ज़ोनों के लिए मंज़ूरियां मिलती रहीं: उत्तर रेलवे के रेवाड़ी-दिल्ली और शकूरबस्ती-बठिंडा सेक्शनों के लिए 680 रूट-किमी पर ₹206 करोड़ (जुलाई 2026), मुरादाबाद मंडल में 712 रूट-किमी पर ₹170 करोड़ (सितंबर 2026), और पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी मंडल में 614.75 रूट-किमी पर ₹223 करोड़ (28 सितंबर 2026)। जून 2026 तक कवच कार्यों पर कुल खर्च ₹3,874 करोड़ तक पहुंच गया, और वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹2,066 करोड़ और आवंटित किए गए हैं।
ईमानदार अनुपात — और इसका रोज़मर्रा के जीवन पर मतलब
31 जुलाई 2026 तक, कवच 4.0 दो सबसे प्राथमिकता वाले मुख्य गलियारों — दिल्ली-मुंबई (1,423 किमी) और दिल्ली-हावड़ा (1,210 किमी) — पर मिलाकर 2,633 रूट-किमी पर चालू किया जा चुका था, जो रेल मंत्रालय द्वारा सबसे अधिक बार दिया जाने वाला आंकड़ा है। इन्हीं दो गलियारों के भीतर भी, एक लोकसभा जवाब के अनुसार लक्षित 3,000 रूट-किमी में से लगभग 2,066 रूट-किमी पर ही ट्रैकसाइड काम पूरा हुआ था — यानी सबसे अधिक ध्यान दिए जा रहे मार्गों पर भी लगभग 69% काम ही पूरा। व्यापक 'चिन्हित नेटवर्क' — गोल्डन क्वाड्रिलैटरल, गोल्डन डायग्नल और अन्य हाई-डेंसिटी सेक्शन, जिन्हें सरकार ने प्राथमिकता दी है — पर 2026 के मध्य तक लगभग 21,800-21,900 रूट-किमी पर काम चल रहा था। यह चिन्हित नेटवर्क खुद भारत के लगभग 70,400 रूट-किमी के कुल ब्रॉड-गेज नेटवर्क का केवल लगभग 30% हिस्सा है; निकट भविष्य के लक्ष्य में पूरे देश को कवर करना अभी शामिल नहीं है। जिस मार्ग पर कवच लग चुका है, वहां यात्री या लोको पायलट के लिए इसका मतलब है कि सिग्नल पार करने पर सिस्टम खुद ब्रेक लगा देगा, तेज़ गति पर रोक लगाएगा, और घने कोहरे में भी — जब दृश्य सिग्नल भरोसेमंद नहीं रहते — सुरक्षित दूरी बनाए रखेगा, यानी एक वास्तविक, ठोस सुरक्षा परत जो पहले उस मार्ग पर मौजूद नहीं थी। लेकिन कहीं अधिक बड़ी संख्या में उन यात्रियों के लिए, जिनका मार्ग अभी इसकी बारी का इंतज़ार कर रहा है, यह सुरक्षा अभी एक वादा है, हकीकत नहीं। सुरक्षा से आगे, कवच आत्मनिर्भरता की भी एक कहानी है: इसे एक भारतीय शोध संस्था और तीन घरेलू निर्माताओं ने महंगी विदेशी ATP प्रणालियों के एक सस्ते विकल्प के रूप में बनाया, जिससे भारतीय रेलवे अपने सबसे सुरक्षा-संवेदनशील काम — टक्कर से बचाव — के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम कर पाया है, फिर भी इसे पूरे नेटवर्क में पहुंचाने की रफ़्तार, बालासोर के तीन साल बाद भी, अभी एक अधूरा काम है।
स्रोत
- Indian Railways Speeds Up Kavach 4.0 Safety Rollout with 472 km Commissioned Across Three SectionsPress Information Bureau, Ministry of RailwaysOfficial / primary source
- Indian Railways approves Kavach 4.0 on 614.75 route-km of Varanasi Division at a cost of Rs 223 crorePress Information Bureau, Ministry of RailwaysOfficial / primary source
- Railways approves ₹206 crore Kavach shield across 680 km in north IndiaBusiness StandardReputable media
- 2023 Odisha train collisionWikipediaSecondary source
- 'KAVACH' Would Not Have Prevented Odisha Train Accident: Indian Railways On Balasore CrashZee NewsReputable media
- Six months after Odisha train accident, Kavach extended by only 10 kmThe News MinuteReputable media
- Kavach 4.0 commissioned on 2,633 rkm of Delhi-Mumbai and Delhi-Howrah routes till July 31, 2026Indian InfrastructureReputable media
- Kavach 4.0 Rollout Delayed Due To Slow Vendor Approvals, Indian Railways Extends Deadline To December 2025SwarajyaReputable media
आख़िरी बार सत्यापित: 30 सित॰ 2026
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