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मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): 2014 से पहले के पुनरीक्षणों से यह कैसे अलग है, 2025-26 में 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सूचियों का क्या हुआ, और सुप्रीम कोर्ट व आलोचकों ने क्या कहा

प्रकाशित: 23 अक्टू॰ 2026

जून 2025मई 2026

पहले बनाम अभी

बिहार के मतदाता (करोड़)

SIR से पहले, 24 जून 2025

7.89

अंतिम सूची, 30 सितंबर 2025

7.42

बिहार: मसौदे के लिए हटे नाम बनाम दावे-आपत्ति चरण में जुड़े नाम (लाख)

मसौदे से बाहर, 1 अगस्त 2025
65
दावे-आपत्ति चरण में फ़ॉर्म 6 से जुड़े
21.5
दावे-आपत्ति चरण में हटे
3.66

उत्तर प्रदेश के मतदाता (करोड़)

SIR से पहले, अक्टूबर 2025

15.44

अंतिम सूची

13.39

पश्चिम बंगाल के मतदाता (करोड़)

SIR से पहले
7.66
निर्णयन के बाद
6.77
अंतिम सूची, 28 फ़रवरी 2026 (निर्णयन से पहले)
7.05

तमिलनाडु के मतदाता (करोड़)

SIR से पहले, अक्टूबर 2025

6.41

अंतिम सूची, 23 फ़रवरी 2026

5.67

मतदाताओं में शुद्ध गिरावट, चुनिंदा राज्य (%)

केरल (बड़े राज्यों में सबसे कम)
3.22
गुजरात (बड़े राज्यों में सबसे ज़्यादा)
13.4
अंडमान-निकोबार (कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा)
16.87

हाल की याद में सबसे बड़ा और तेज़ मतदाता-सूची पुनरीक्षण 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में सूचियों को लाखों-करोड़ों से घटा चुका है, और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निर्वाचन आयोग यह कर सकता है। हटाए गए नाम ज़्यादातर मृत, दोहरे और स्थानांतरित मतदाताओं के हैं या पात्र लोग भी हैं जो काग़ज़ नहीं दे सके, यह बहस अभी जारी है और पढ़े गए स्रोत इसे तय नहीं करते।

SIR क्या है और इसे कौन चलाता है

मतदाता सूची में हर निर्वाचन क्षेत्र के वे लोग दर्ज होते हैं जिन्हें वोट देने का अधिकार है। इसे अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक संस्था भारत निर्वाचन आयोग (ECI) तैयार और संशोधित करता है, केंद्र सरकार नहीं। यह प्रविष्टि इसलिए शामिल है कि SIR इस दौर की सबसे चर्चित शासन-प्रक्रियाओं में है और केंद्र, राज्य सरकारें व दल सब इस पर बहस कर रहे हैं, इसलिए नहीं कि यह कोई सरकारी योजना है। सुप्रीम कोर्ट मामले में दर्ज ECI के घोषित उद्देश्य हैं: हर पात्र नागरिक दर्ज हो, कोई अपात्र दर्ज न हो, मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियाँ हटें; आयोग शहरीकरण, प्रवासन, नए युवा मतदाताओं और मौतों की कम दर्ज़गी का हवाला देता है। ECI इसे सूची की सफ़ाई बताता है, नागरिकता का फ़ैसला नहीं।

2014 से पहले: गहन और संक्षिप्त पुनरीक्षण

वाजीराम एंड रवि की एक व्याख्या, जो इंडियन एक्सप्रेस का हवाला देती है और जिसे ECI के अपने रिकॉर्ड से नहीं मिलाया गया, गहन पुनरीक्षण 1952-56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983-84, 1987-89, 1992, 1993, 1995 और 2002, 2003, 2004 में गिनाती है। वह कहती है कि 1993 और 1995 के पुनरीक्षणों ने मतदाता फ़ोटो पहचान पत्र (EPIC) लाने में मदद की, हालाँकि वह मुख्य उद्देश्य नहीं था; 1980 के दशक से ध्यान अपात्र प्रविष्टियाँ रोकने पर गया; और बाद में संक्षिप्त पुनरीक्षण आम हो गए। गहन पुनरीक्षण में अधिकारी घर-घर जाकर प्रविष्टियाँ दोबारा जाँचते हैं; संक्षिप्त में मौजूदा सूची दावे-आपत्तियों से अपडेट होती है। बिहार का पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था, इसलिए ECI ने 2025 के अभियान को वहाँ दो दशक से ज़्यादा में पहला बताया। पढ़े गए स्रोत यह नहीं बताते कि उन पुराने पुनरीक्षणों में कितने नाम हटे या उन्हें अदालत में चुनौती मिली या नहीं।

2014 के बाद, SIR से पहले: 2015 का आधार-जोड़ो अभियान

2015 में ECI ने राष्ट्रीय निर्वाचन सूची शुद्धिकरण एवं प्रमाणीकरण कार्यक्रम (NERPAP) चलाया, जिसमें मतदाता पहचान संख्या को आधार से जोड़ा गया। रिपोर्टों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2015 में इसे रोक दिया; आदेश स्वयं नहीं पढ़ा गया। दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी की गई एक याचिका का आरोप है कि ECI ने 2015 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 46 लाख प्रविष्टियाँ हटाईं, कि सॉफ़्टवेयर ने 37,54,648 मतदाताओं को दोहरा बताया जिनमें से फ़ील्ड जाँच में 2,47,789 (8%) की पुष्टि हुई, और कि कोई ऑडिट ट्रेल साझा नहीं की गई। ये याचिकाकर्ता के आरोप हैं; ECI का उत्तर नहीं मिला। अन्य रिपोर्टें 30, 41.5 और 55 लाख बताती हैं, जो संभवतः अलग मापदंड और तारीख़ें हैं, इसलिए कोई एक संख्या तय नहीं मानी गई। तेलंगाना के एक चुनाव अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि ज़्यादातर नाम सही हटे थे।

2025-26 का SIR कैसे चलता है

बिहार के लिए ECI के 24 जून 2025 के आदेश में 1 जुलाई 2025 को 18 वर्ष का होना पात्रता तिथि रखा गया। बूथ स्तर अधिकारी (BLO) पहले से भरे गणना-प्रपत्र लेकर घर जाते हैं; प्रपत्र ECINET से ऑनलाइन भी भरे जा सकते हैं। 2003 की बिहार सूची में दर्ज मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज़ नहीं माँगे गए (ECI ने अदालत को बताया कि लगभग 6.5 करोड़ को दस्तावेज़ नहीं देने थे); बाक़ी को 11 सूचीबद्ध दस्तावेज़ों में से एक देना था, जिनमें शुरू में आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड नहीं थे। मसौदा सूची में प्रपत्र लौटाने वाले होते हैं; फिर दावे-आपत्तियाँ, सुनवाई और अंतिम सूची। अदालत के सार के अनुसार प्रपत्र न देने पर मसौदे में अस्थायी रूप से नाम नहीं आता, और अंतिम हटाव दावे-आपत्ति चरण के बाद ही होता है, जिसमें कारण-बताओ नोटिस, तर्कसंगत आदेश और दो स्तर की अपील है। चरण 2 की घोषणा 27 अक्टूबर 2025 को 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हुई, लगभग 51 करोड़ मतदाता, सूचियाँ फ़्रीज़, और 2002-04 की सूची वालों को अतिरिक्त दस्तावेज़ नहीं। चरण 3, घोषित 14 मई 2026, 16 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश, लगभग 36.73 करोड़ मतदाता; हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बाद के लिए रखे गए हैं। ECI के अनुसार चरण 3 का कार्यक्रम जनगणना के मकान-सूचीकरण में लगे फ़ील्ड कर्मचारियों को ध्यान में रखकर बना।

अब तक के नतीजे

बिहार: 1 अगस्त 2025 के मसौदे से 65 लाख नाम बाहर थे; दावे-आपत्ति चरण में फ़ॉर्म 6 से 21.5 लाख जुड़े और 3.66 लाख हटे; 30 सितंबर 2025 की अंतिम सूची में लगभग 7.42 करोड़ मतदाता थे, जबकि 24 जून को 7.89 करोड़, यानी लगभग 47 लाख या 6% की शुद्ध गिरावट। बिज़नेस स्टैंडर्ड की 20 जुलाई 2026 की राज्यवार तालिका (जोड़ने के बाद शुद्ध): उत्तर प्रदेश 15.44 करोड़ से 13.39 करोड़ (13.21% गिरावट); गुजरात 5.08 से 4.40 करोड़ (13.4%); तमिलनाडु लगभग 6.41 से 5.67 करोड़ (11.5%); छत्तीसगढ़ 11.8%; गोवा 10.76%; राजस्थान 5.74%; मध्य प्रदेश 5.97%; केरल 3.22% (8,97,211 मतदाता); पुडुचेरी 7.57%; अंडमान-निकोबार 16.87%, सबसे ज़्यादा प्रतिशत; लक्षद्वीप 0.36%। सभी 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में शुद्ध गिरावट लगभग 5.84 करोड़ है। पश्चिम बंगाल में एक अलग चरण था: 28 फ़रवरी 2026 की अंतिम सूची में 63.7 लाख हटाने और 1.89 लाख जोड़ने के बाद 7.05 करोड़ मतदाता थे, 60.1 लाख नाम 'न्यायिक निर्णयन' (adjudication) में रखे गए और उनमें से 27.2 लाख हटे, जिससे मतदाता 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 6.77 करोड़ रह गए, यानी 11.6% शुद्ध गिरावट। आकाशवाणी 'लगभग 91 लाख' हटाए जाने की बात कहता है, जो लगभग 63.7 और 27.2 लाख के कुल हटाव से मेल खाती है; बिज़नेस स्टैंडर्ड का 88.9 लाख जोड़ने के बाद का शुद्ध आँकड़ा है। पढ़े गए स्रोतों में ज़्यादातर राज्यों के लिए हर हटाव का कारण (मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरापन, न मिलना) उपलब्ध नहीं था।

अदालतों ने क्या कहा

एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग में सुप्रीम कोर्ट ने पहले (जुलाई 2025) ECI से आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड पर विचार करने को कहा, 14 अगस्त 2025 को निर्देश दिया कि मसौदे से बाहर लगभग 65 लाख नाम कारणों सहित और मतदाता पहचान संख्या से खोजने योग्य रूप में प्रकाशित हों, और 8 सितंबर 2025 को निर्देश दिया कि आधार को प्रामाणिकता की जाँच के अधीन 12वें पहचान दस्तावेज़ के रूप में माना जाए, नागरिकता के प्रमाण के रूप में नहीं। 29 जनवरी 2026 को 29 सुनवाई-दिनों के बाद फ़ैसला सुरक्षित हुआ और 27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश व एक अन्य न्यायाधीश की पीठ ने सुनाया। LiveLaw और सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के अनुसार इसने माना कि ECI अनुच्छेद 324 और 1950 अधिनियम की धारा 21(3) के तहत SIR करा सकता है, कि SIR अधिनियम और नियमों का 'स्थान नहीं लेता', कि 2003 का आधार न मनमाना है न अतार्किक, और कि ECI चुनावी प्रयोजन के लिए नागरिकता की सीमित जाँच कर सकता है पर उसका निष्कर्ष नागरिकता पर 'अंतिम नहीं' हो सकता, संदिग्ध मामले सक्षम प्राधिकारी को भेजे जाएँगे। इसने ECI से कहा कि 2003 की बिहार सूची से संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए नाम चार हफ़्ते में केंद्र को भेजे जाएँ। फ़ैसले का पूरा पाठ नहीं पढ़ा गया, केवल ये रिपोर्टें और ऑब्ज़र्वर का सार।

विवाद और दोनों पक्ष

याचिकाकर्ता और विपक्षी दल कहते हैं कि SIR तीसरी तरह का पुनरीक्षण है जिसका अधिनियम या नियमों में आधार नहीं, कि यह सबूत का बोझ मतदाता पर डालता है ('अगर कोई एक प्रपत्र नहीं भरता तो वह बाहर है'), कि 2003 की सीमा मनमानी है, कि लगभग एक लाख BLO के साथ 90 दिन कम थे, और कि आधार को छोड़ा गया जबकि बिहार के ज़्यादातर लोगों के पास वह है। बंगाल के सत्तारूढ़ दल और कांग्रेस, भाकपा व माकपा के नेताओं ने कहा है कि पात्र मतदाता, अल्पसंख्यक, प्रवासी और ग़रीब हट रहे हैं; कांग्रेस ने कहा कि ECI की नीयत संदेह के घेरे में है। ECI ने वरिष्ठ अधिवक्ता के माध्यम से तर्क दिया कि अनुच्छेद 324 'शक्ति का भंडार' है, कि सुरक्षा उपायों में घर-घर जाँच, नोटिस और दो अपीलें हैं, कि अभ्यास मतदाता सूची का है 'निर्वासन' का नहीं, और कि 2003 से अब तक एक करोड़ से ज़्यादा मौतें और 70 लाख प्रवासन हुए हैं। भाजपा प्रवक्ताओं ने विपक्ष की आलोचना को पाखंड कहा और कहा कि अवैध प्रविष्टियाँ हटनी चाहिए; उन्होंने SIR को अवैध आप्रवासन से भी जोड़ा है, जबकि ECI कहता है कि वह नागरिकता तय नहीं कर रहा। BLO के काम के दबाव पर परिवारों और एक राज्य दल ने आरोप लगाया कि मौतें दबाव से हुईं; पश्चिम बंगाल के एक मामले में दूसरी रिपोर्ट ने मृत्यु का कारण ब्रेन स्ट्रोक बताया। ट्रिब्यून के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से BLO का दबाव कम करने के लिए अधिक कर्मचारी देने को कहा। BLO की मौतों का कोई स्वतंत्र आँकड़ा नहीं मिला।

जनता की प्रतिक्रिया और मीडिया कवरेज

SIR पर मतदाताओं का कोई जनमत सर्वेक्षण नहीं मिला। स्रोत दिखाते हैं कि कवरेज पर राजनीतिक विवाद और आधिकारिक प्रगति बुलेटिन हावी हैं। ECI ने बताया कि दिसंबर 2025 की शुरुआत तक चरण 2 के 99.93% गणना-प्रपत्र बँट चुके थे और लगभग 97.49% डिजिटाइज़ हुए, उत्तर प्रदेश सबसे कम 94.04% पर, और समय-सीमा बढ़ाई गई। मतदाताओं के रोज़ के अनुभव, जैसे कतारें, प्रपत्र और दस्तावेज़ों की खोज, पढ़े गए पन्नों में नहीं मिले। विपक्षी नेताओं ने इसे 'लोकतंत्र के ख़िलाफ़ साज़िश' कहा; सत्ता-पक्ष के प्रवक्ताओं ने इस बयानबाज़ी को पाखंड कहा; ऑर्गनाइज़र ने 'Beyond Vote Chori' शीर्षक से ECI के पक्ष में लेख छापा, जबकि सबरंग, दृष्टि IAS और बिज़नेस स्टैंडर्ड ने आँकड़ों का ब्योरा दिया। पाठक यह मानकर चलें कि दोनों राजनीतिक खेमे एक ही कुल संख्या को अलग ढंग से पढ़ते हैं।

सूक्ष्म दृष्टि: मतदाता के लिए इसका क्या अर्थ है

वोट देने के लिए नाम सूची में होना चाहिए। व्यावहारिक कसौटी यह है कि आपका गणना-प्रपत्र लौटा या नहीं, आप 2002-04 की सूची में हैं (अतिरिक्त दस्तावेज़ नहीं) या नहीं (दस्तावेज़ सूची), और क्या आप मसौदे में हैं। जिनके नाम छूटे वे फ़ॉर्म 6 से दावा कर सकते थे; बिहार में उस चरण में 21.5 लाख जुड़े, और ECI ने अदालत को बताया कि 8 सितंबर 2025 तक बाहर किए गए 65 लाख में से 33,351 समावेश-दावे आए थे, जिनमें 22,723 आधार आदेश के बाद के थे। आलोचक कहते हैं कि विवाह के बाद नाम बदलने वाली महिलाओं, प्रवासी मज़दूरों और काग़ज़ न रखने वालों के सामने ज़्यादा अड़चनें हैं; यह एक अकादमिक विश्लेषण है जिसे स्रोतों ने केवल संक्षेप में बताया।

व्यापक दृष्टि: सूची की सटीकता और प्रक्रिया पर भरोसा

साफ़ सूची निष्पक्ष और निष्पक्ष दिखने वाले चुनाव का आधार है, और मृत, दोहरी व स्थानांतरित प्रविष्टियों से फूली सूचियाँ पुरानी जानी-मानी समस्या हैं। इसके सामने, किसी भी बड़े हटाव अभियान को यह दिखाना पड़ता है कि हटाए गए नाम सही थे। अब तक के आँकड़े 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 0.4% से 16.9% की शुद्ध गिरावट और दावे-आपत्ति चरण में बड़ी वापसी दिखाते हैं; वे यह नहीं दिखाते कि कितने नाम ग़लत हटे या कितनी फ़र्ज़ी प्रविष्टियाँ बची हैं। अदालत की रिपोर्ट की गई कसौटी सुरक्षा उपायों के साथ आनुपातिकता थी; एक स्रोत के अनुसार उसने यह भी कहा कि एक भी ग़लत बहिष्करण साबित होने पर अभ्यास रद्द हो सकता है, जिसकी फ़ैसले के पाठ से पुष्टि नहीं हुई।

जो शामिल नहीं है

ECI के अपने आदेश, प्रेस नोट और अंतिम सूची के आँकड़े, और सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले का पाठ (केवल LiveLaw की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर का सार पढ़ा गया) नहीं खोले गए। हटाव के कारणवार आँकड़े, ज़्यादातर राज्यों के दावे-आपत्ति आँकड़े, अपीलों के नतीजे, सूचियों के संदर्भ में बिहार 2025 और बंगाल 2026 के चुनाव नतीजे, चरण 3 के नतीजे (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक की अंतिम सूचियाँ सितंबर-अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित थीं), उत्तर प्रदेश की अंतिम सूची की तारीख़ (एक रिपोर्ट के अनुसार टली), अगस्त 2015 का सुप्रीम कोर्ट आदेश, और मतदाताओं का कोई सर्वेक्षण नहीं मिला। स्रोत इस पर असहमत हैं कि पिछले गहन पुनरीक्षण को कितना समय हुआ (बिहार के लिए दो दशक से ज़्यादा; ECI के कारणों की LiveLaw रिपोर्ट में 'चार दशक से ज़्यादा') और बंगाल के कुल पर (91 लाख कुल, 88.9 लाख शुद्ध)।

मतदाता सूचीSIRनिर्वाचन आयोग

स्रोत

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आख़िरी बार सत्यापित: 23 अक्टू॰ 2026

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